मिडिल ईस्ट तनाव का भारत पर असर: ईंधन महंगा, बंदरगाहों पर अटका चावल का बड़ा स्टॉक

ईरान   ईरान-इजरायल युद्ध के बाद पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बिगड़ गए हैं। Strait of Hormuz में बढ़ते खतरे और जहाजों की आवाजाही पर असर ने वैश्विक सप्लाई चेन को झटका दिया है। कच्चे तेल और नेचुरल गैस की आपूर्ति पर दबाव के साथ-साथ भारत का बासमती चावल निर्यात भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। समंदर और बंदरगाहों पर अटका लाखों टन चावल ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के मुताबिक, भारत से खाड़ी देशों को भेजा गया करीब 4 से 6 लाख टन बासमती चावल ट्रांजिट में, भारतीय बंदरगाहों पर या गंतव्य देशों के पोर्ट पर फंसा

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Published On :

मार्च 3, 2026

ईरान  
ईरान-इजरायल युद्ध के बाद पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बिगड़ गए हैं। Strait of Hormuz में बढ़ते खतरे और जहाजों की आवाजाही पर असर ने वैश्विक सप्लाई चेन को झटका दिया है। कच्चे तेल और नेचुरल गैस की आपूर्ति पर दबाव के साथ-साथ भारत का बासमती चावल निर्यात भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।

समंदर और बंदरगाहों पर अटका लाखों टन चावल
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के मुताबिक, भारत से खाड़ी देशों को भेजा गया करीब 4 से 6 लाख टन बासमती चावल ट्रांजिट में, भारतीय बंदरगाहों पर या गंतव्य देशों के पोर्ट पर फंसा हुआ है। आम तौर पर खाड़ी देशों तक चावल पहुंचने में करीब 40 दिन लगते हैं लेकिन मौजूदा संकट ने इस पूरी प्रक्रिया को बाधित कर दिया है।

5-6 हजार करोड़ रुपए दांव पर
फंसे हुए कंसाइनमेंट की अनुमानित वैल्यू 5,000 से 6,000 करोड़ रुपए बताई जा रही है। शिपिंग कंपनियों के बीमा कवर रद्द होने और जोखिम बढ़ने से कंटेनर फ्रेट दरें दोगुनी से ज्यादा हो गई हैं। ऐसे में निर्यातकों ने नई बुकिंग और पैकिंग का काम रोक दिया है और पहले से किए गए अनुबंधों को प्राथमिकता दी जा रही है।

70% निर्यात खाड़ी पर निर्भर
भारत हर साल करीब 60 लाख टन से अधिक बासमती चावल निर्यात करता है, जिसमें से लगभग 70% हिस्सा खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, ईरान और यूएई को जाता है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 60.65 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ, जिसकी कीमत 50,312 करोड़ रुपए (5.94 अरब डॉलर) रही।
 
फोर्स मेज्योर क्लॉज का सहारा?
ट्रेड सूत्रों के अनुसार, यदि हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो कुछ निर्यातक 'फोर्स मेज्योर' क्लॉज का सहारा ले सकते हैं। यह प्रावधान युद्ध या प्राकृतिक आपदा जैसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में अनुबंध की शर्तों से अस्थायी राहत देता है।

क्या भारत में सस्ता होगा बासमती?
रिकॉर्ड पैदावार के बीच मांग घटने से बासमती की कीमतों में पहले ही करीब 6% की गिरावट आ चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्यात बाधित रहा तो घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ने से दाम और नीचे आ सकते हैं। हालांकि ट्रेडर्स का कहना है कि मिडिल ईस्ट में बासमती एक जरूरी खाद्य वस्तु है और भारतीय चावल का वास्तविक विकल्प नहीं है। जैसे ही हालात सामान्य होंगे, खाड़ी देशों से मांग दोबारा तेजी पकड़ सकती है। फिलहाल निर्यातक 'वेट एंड वॉच' की रणनीति अपना रहे हैं।

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