Bangladesh Elections 2026: ढाका में ‘किंग’ की तरह लौटे तारिक, पर क्या बागी नेता बिगाड़ देंगे पीएम बनने का खेल?

बसपा सुप्रीमो मायावती ने बजट 2026 को सत्ताधारी पार्टी की 'पूंजीवादी नीयत' का आईना करार दिया है। उन्होंने कहा कि योजनाओं के नाम भले ही बड़े हों, लेकिन जमीनी स्तर पर दलितों और पिछड़ों के लिए सब शून्य है। क्या सरकार वाकई गरीबों को भूलकर सिर्फ अमीरों की तिजोरी भर रही है?

Bangladesh Elections 2026

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 1, 2026

Bangladesh Elections 2026: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यवाहक चेयरमैन तारिक रहमान के लिए वतन वापसी की राह भावनाओं और चुनौतियों से भरी रही है। 17 वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद जब वे बांग्लादेश लौटे, तो उनके स्वागत के कुछ ही समय बाद उनकी माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन हो गया। इस व्यक्तिगत क्षति के बावजूद, तारिक रहमान ने पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। हालाँकि, 17 साल बाद सत्ता की दहलीज तक पहुँचना उनके लिए जितना आसान लग रहा था, ज़मीनी हकीकत उससे कहीं अधिक जटिल और काँटों भरी साबित हो रही है।

79 सीटों पर ‘बागी’ उम्मीदवारों ने बढ़ाई बीएनपी की धड़कनें

बीएनपी के लिए इस चुनाव में सबसे बड़ी बाधा विपक्षी दल नहीं, बल्कि उसकी अपनी पार्टी के भीतर पनपा असंतोष है। बांग्लादेश की 300 संसदीय सीटों में से कम से कम 79 सीटों पर बीएनपी के नेता पार्टी के आधिकारिक फैसलों को धता बताते हुए ‘बागी’ कैंडिडेट के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इनमें से 46 सीटों पर ये बागी उम्मीदवार इतने मजबूत हैं कि वे मुख्य पार्टी प्रत्याशी की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं। यह आंतरिक फूट तारिक रहमान के ‘क्लीन स्वीप’ के सपने के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभरी है।

वोटों के ध्रुवीकरण से जमात-ए-इस्लामी को लाभ की संभावना

राजनीतिक विशेषज्ञों और स्थानीय मीडिया ‘प्रथम आलो’ के विश्लेषण के अनुसार, बीएनपी में मची यह रार अन्य दलों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है। कई निर्वाचन क्षेत्रों में बागी उम्मीदवारों के पक्ष में भारी मतदान होने की संभावना है। यदि बीएनपी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगती है, तो इसका सीधा लाभ जमात-ए-इस्लामी और उसके समर्थित उम्मीदवारों को मिल सकता है। मतों का यह विभाजन बीएनपी को उन सीटों पर भी हार का स्वाद चखा सकता है जिन्हें पार्टी का गढ़ माना जाता है।

टिकट बँटवारे का गणित और गठबंधन की मजबूरी

12 फरवरी को होने वाले मतदान के लिए बीएनपी ने कुल 291 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। रणनीतिक रूप से पार्टी ने 8 सीटें अपने समान विचारधारा वाले सहयोगी दलों के लिए छोड़ी हैं। कोमिला-4 जैसी सीटों पर तकनीकी कारणों से उम्मीदवार न होने के बावजूद, पार्टी ने बड़े पैमाने पर घेराबंदी की कोशिश की थी। शुरुआत में 117 क्षेत्रों में 190 नेताओं ने नामांकन दाखिल किया था, लेकिन पार्टी के दबाव और मान-मनौव्वल के बाद यह संख्या घटकर 92 रह गई, जो अब भी चुनाव परिणाम बदलने के लिए पर्याप्त है।

पार्टी की अनुशासनात्मक कार्रवाई और संगठनात्मक कमजोरी

बीएनपी नेतृत्व ने बागियों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाते हुए कई नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया है और कई स्थानीय कमेटियों को भंग कर दिया है। इसके बावजूद, बागी उम्मीदवार मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पार्टी चेयरमैन के सलाहकार महदी अमीन का कहना है कि लंबे संघर्ष के बाद हर नेता अपनी पहचान और भागीदारी चाहता है, और एक सीट पर एक ही टिकट होने के कारण उपजा असंतोष स्वाभाविक है। हालांकि, विश्लेषक इसे पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी मान रहे हैं, जिसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ना तय है।

तारिक रहमान के नेतृत्व की असली परीक्षा

यह चुनाव केवल सत्ता हासिल करने का जरिया नहीं, बल्कि तारिक रहमान के नेतृत्व कौशल की परीक्षा भी है। एक तरफ जहाँ वे अपनी माँ की विरासत को सँभालने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर “अपनों” से लड़ना पड़ रहा है। 12 फरवरी के नतीजे यह तय करेंगे कि क्या बीएनपी अपनी आंतरिक कलह से उबरकर बांग्लादेश की सत्ता पर दोबारा काबिज हो पाएगी या बागियों की जिद उसे एक बार फिर विपक्ष की बेंचों तक सीमित कर देगी।

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