Manipur Politics 2026: मणिपुर में पिछले एक साल से लागू राष्ट्रपति शासन के बाद अब राज्य की कमान फिर से निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपने की तैयारी शुरू हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राज्य में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया को औपचारिक रूप से गति दे दी है। इस महत्वपूर्ण बदलाव के लिए बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने तरुण चुग को ‘नेशनल ऑब्जर्वर’ नियुक्त किया है। उनकी मुख्य भूमिका विधायक दल की बैठक का संचालन करना और सर्वसम्मति से नए नेता का चुनाव सुनिश्चित करना होगा। यह कदम राज्य में लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक शून्यता को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।
दिल्ली में एनडीए विधायकों का जमावड़ा: मंगलवार को होगा निर्णायक फैसला
मणिपुर की भावी सरकार की रूपरेखा तय करने के लिए एनडीए (NDA) के लगभग सभी विधायक दिल्ली पहुंच चुके हैं। मंगलवार को होने वाली उच्च स्तरीय बैठक में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के नामों पर अंतिम मुहर लगने की प्रबल संभावना है। सत्ता की इस रेस में पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, विधानसभा अध्यक्ष सत्यब्रता सिंह और दिग्गज नेता वाई खेमचंद सिंह के नामों की चर्चा तेज है। बीजेपी की प्रदेश अध्यक्ष ए. शारदा देवी भी केंद्रीय नेतृत्व के साथ विचार-विमर्श के लिए दिल्ली में मौजूद हैं, जहाँ राज्य के भविष्य और स्थिरता को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है।
समुदायों के बीच संतुलन की रणनीति: मैतेयी और कुकी समुदायों को साधने की कोशिश
मणिपुर में पिछले साल भड़की जातीय हिंसा के घाव अब भी गहरे हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी सरकार बनाना है जो राज्य के दोनों प्रमुख समुदायों—मैतेयी और कुकी—के बीच विश्वास बहाल कर सके। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि बीजेपी इस बार ‘बैलेंसिंग एक्ट’ (संतुलन बनाने की रणनीति) पर काम कर रही है। सूत्रों के अनुसार, शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पदों का बंटवारा समुदायों के आधार पर किया जा सकता है। इस समावेशी दृष्टिकोण का उद्देश्य यह संदेश देना है कि नई सरकार सभी समुदायों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
राष्ट्रपति शासन की समयसीमा और गोपनीय बैठकें: क्या है सरकार का रोडमैप?
ज्ञात हो कि मणिपुर में पहली बार 13 फरवरी, 2025 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जिसकी अवधि अब अगले सप्ताह समाप्त होने वाली है। सरकार गठन की राह आसान बनाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने पिछले कुछ महीनों में कुकी और मैतेयी विधायकों के साथ-साथ सहयोगी दलों—एनपीएफ (NPF) और एनपीपी (NPP)—के साथ गोपनीय बैठकों के कई दौर पूरे किए हैं। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकार गठन के बाद किसी भी तरह का आंतरिक विद्रोह न हो और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में रहे।
नई सरकार के सामने चुनौतियां: कानून-व्यवस्था और अविश्वास की खाई को पाटना
भले ही नई सरकार का गठन होने जा रहा है, लेकिन मणिपुर की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय जटिलताएं मुख्यमंत्री के लिए ‘कांटों की सेज’ साबित होंगी। नई सरकार के सामने पहली और सबसे बड़ी चुनौती समुदायों के बीच पैदा हुई अविश्वास की गहरी खाई को पाटना और राज्य की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना होगा। यदि बीजेपी एक स्थिर और समावेशी सरकार बनाने में सफल रहती है, तो यह पूर्वोत्तर भारत में उसकी ‘संकट मोचक’ की छवि को और मजबूत करेगा। सबकी निगाहें अब दिल्ली में होने वाली बैठक पर टिकी हैं, जो मणिपुर का नया राजनीतिक भविष्य तय करेगी।










