Raghu Rai Death : प्रख्यात फोटोग्राफर रघु राय का निधन, कैमरे की नज़र से इतिहास लिखने वाला युग थमा

भारत के सबसे प्रभावशाली फोटो पत्रकार रघु राय का दिल्ली में निधन हो गया। भोपाल गैस त्रासदी की तस्वीरों से पूरी दुनिया को झकझोरने वाले राय ने छह दशकों तक भारतीय इतिहास को कैमरे में कैद किया। क्या आप जानते हैं उनकी वह कौन सी अधूरी ख्वाहिश थी जिसे वह पूरा न कर सके?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 26, 2026

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Raghu Rai Death : भारतीय फोटोग्राफी जगत के एक दैदीप्यमान नक्षत्र, रघु राय अब हमारे बीच नहीं रहे। रविवार तड़के एक निजी अस्पताल में 83 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से कला और पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। रघु राय केवल एक छायाकार नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत के इतिहास, उसकी पीड़ा, उसकी संस्कृति और उसके उतार-चढ़ाव को ‘फ्रीज’ कर उसे जीवंत दस्तावेजों में तब्दील कर दिया। उनके बेटे नितिन राय ने बताया कि वे लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे, जो अंततः मस्तिष्क तक फैल गया था।

विभाजन की कोख से जन्मे और विश्व पटल पर छाए

रघु राय का जन्म 18 दिसंबर 1942 को अविभाजित पंजाब के झंग (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके करियर का विस्तार पांच दशकों से भी अधिक रहा। उन्होंने अपनी फोटोग्राफी के जरिए भारत की आत्मा को कैद करने की कोशिश की। उनके परिवार में पत्नी गुरमीत, पुत्र नितिन और तीन बेटियां हैं। उनका अंतिम संस्कार रविवार शाम लोधी श्मशान घाट पर किया जाएगा। रघु राय ने न केवल कैमरे से तस्वीरें खींचीं, बल्कि फोटोग्राफी की कला पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं, जो आज भी नए फोटोग्राफरों के लिए बाइबिल मानी जाती हैं।

भोपाल गैस त्रासदी: एक तस्वीर जिसने दुनिया को हिला दिया

रघु राय के करियर की सबसे प्रभावशाली और मार्मिक उपलब्धि 1984 की भोपाल गैस त्रासदी का कवरेज माना जाता है। 4 दिसंबर 1984 को जब वे भोपाल पहुंचे, तो उन्होंने एक ऐसी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर खींची जिसने पूरी दुनिया का ध्यान इस मानवीय प्रलय की ओर खींचा। वह तस्वीर, जिसमें एक मासूम बच्चे को मिट्टी में दफन किया जा रहा था, आज भी उस भयानक हादसे की सबसे बड़ी गवाह मानी जाती है। उस फोटो ने न केवल तहलका मचाया, बल्कि यूनियन कार्बाइड कारखाने की लापरवाही और उससे उपजे दर्द को एक वैश्विक पहचान दी।

ऐतिहासिक घटनाओं के जीवंत साक्षी और फोटो पत्रकारिता के स्तंभ

रघु राय का काम केवल हादसों तक सीमित नहीं था। उन्होंने देश में आपातकाल (Emergency) के दौर को अपनी आंखों से देखा और उसे लेंस के जरिए सुरक्षित किया। उनकी फोटो पत्रकारिता में एक अनोखा दृष्टिकोण था; वे भीड़ में भी उस एक चेहरे को ढूंढ निकालते थे जो पूरी कहानी कह देता था। उनकी तस्वीरों को महज चित्र कहना गलत होगा, वे वास्तव में ‘जीवंत दस्तावेज’ हैं। उन्होंने पद्म श्री जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित होकर भारतीय फोटोग्राफी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव दिलाया।

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री और वह काली रात का मंजर

रघु राय की तस्वीरों के माध्यम से ही भावी पीढ़ियों ने 2 दिसंबर 1984 की उस काली रात को समझा। जब टैंक नंबर 610 से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ, तो सुबह होने तक भोपाल एक कब्रिस्तान में तब्दील हो चुका था। 3000 से अधिक मौतों और हजारों के शारीरिक रूप से अपंग होने की उस दास्तां को रघु राय के कैमरे ने बिना शब्दों के बयां किया। हालांकि बाद में पाब्लो बार्थोलमियो ने भी इस त्रासदी को शूट किया, लेकिन रघु राय के दृष्टिकोण ने जो संवेदनशीलता दिखाई, वह अद्वितीय थी।

एक युग का अंत: कला जगत में अपूरणीय क्षति

रघु राय का जाना भारतीय कला जगत के लिए एक ऐसा शून्य पैदा कर गया है जिसे भरना नामुमकिन है। उन्होंने सिखाया कि फोटोग्राफी केवल शटर दबाना नहीं, बल्कि उस पल को महसूस करना और उसे इतिहास की गवाही के रूप में पेश करना है। उनके निधन पर देश के दिग्गजों ने शोक व्यक्त किया है। रघु राय भले ही शारीरिक रूप से चले गए हों, लेकिन भारत के गांवों, शहरों, चेहरों और इतिहास के पन्नों पर उनकी खींची गई तस्वीरें हमेशा अमर रहेंगी। उनके काम ने साबित किया कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है।

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