क्या कांग्रेस खुद कमजोर कर रही राहुल गांधी की राजनीति? सोनिया गांधी क्यों हैं खामोश

नई दिल्ली हर बच्चा अपने मां बाप के प्यार दुलार में बड़ा होता है. नेता हो आम आदमी. बड़ा राजनीतिक घराना हो या कॉरपोरेट पावर हाउस. गांधी फैमिली में भी यही होता आया. आयरन लेडी होते हुए भी इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बेटों को प्यार से पाला. पर संजय गांधी और राजीव गांधी बिल्कुल अलग मिजाज के निकले. संजय गांधी की रुचि पॉलिटिक्स में थी और वो अंदर ही अंदर इतने पावरफुल हो गए कि बड़े से बड़े कैबिनेट मंत्री भी उनकी मर्जी के बिना इंदिरा से नहीं मिल सकते थे. आपातकाल में तो संजय पावर ने जो किया

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Published On :

मई 25, 2026

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नई दिल्ली

हर बच्चा अपने मां बाप के प्यार दुलार में बड़ा होता है. नेता हो आम आदमी. बड़ा राजनीतिक घराना हो या कॉरपोरेट पावर हाउस. गांधी फैमिली में भी यही होता आया. आयरन लेडी होते हुए भी इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बेटों को प्यार से पाला. पर संजय गांधी और राजीव गांधी बिल्कुल अलग मिजाज के निकले. संजय गांधी की रुचि पॉलिटिक्स में थी और वो अंदर ही अंदर इतने पावरफुल हो गए कि बड़े से बड़े कैबिनेट मंत्री भी उनकी मर्जी के बिना इंदिरा से नहीं मिल सकते थे. आपातकाल में तो संजय पावर ने जो किया वो सबको पता है. अपनी जिद के आगे वो मां की भी नहीं सुनते थे. सीएम बदलने तक का फैसला संजय गांधी कर सकते थे. अकाल मृत्यु के साथ 23 जून 1980 को संजय का संक्षिप्त सक्रिय इतिहास खत्म हो गया। 

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव को बागडोर तो मिली लेकिन संजय गांधी वाली पकड़ नहीं थी. वो उन्हीं नेताओं की चौकड़ी में आगे बढ़े जो कभी उनकी मां के साथ हुआ करते थे. खुद का रॉयल मृदुभाषी अंदाज. जब 1991 में उनकी हत्या हो गई तो सोनिया गांधी को पार्टी संभालने में समय लगा. पीवी नरसिंह राव की पीएम पारी के बाद 1998 में सीताराम केसरी को धकिया कर वो अध्यक्ष बनीं. इटालियन बेबी पर बवाल न हुआ होता तो मनमोहन सिंह की जगह वही पीएम बनती लेकिन नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाकर सोनिया ने पार्टी और सरकार दोनों को मुट्ठी में कर लिया। 

पर राहुल गांधी कुछ नहीं सीख पाए. 2017 से 2019 तक दो साल अध्यक्ष तो रहे लेकिन न अपनी मां और न ही संजय गांधी वाली बात इनमें दिखाई दी. बल्कि हो इससे उलट रहा है. कहने को तो मल्लिकार्जुन खरगे अभी अध्यक्ष हैं और सोनिया बीमार हैं. इसलिए राहुल गांधी के पास ही पार्टी की चाबी है पर ये किसी काम का नहीं. राहुल लगातार पार्टी में बेइज्जत हो रहे हैं. और ये सिलसिला पिछले 9 साल से चल रहा है। 

जब खरगे उनके सामने अड़ गए
जब राहुल कोई फैसला करते हैं तो उसे स्टेट यूनिट नहीं मानती. और जब स्टेट यूनिट कोई फैसला करता है तो उसे राहुल गांधी नहीं मानते. इसी कन्फ्यूजन में कांग्रेस खत्म हो रही है. हरियाणा में हुड्डा को छूट दे दी तो जीता चुनाव हार गए. तमिलनाडु में एक्टर विजय से प्री पोल अलाएंस करना चाहते थे तो खरगे जी अड़ गए. सबसे दुखद बात ये रही कि बच्चे के फैसले में मां सोनिया कभी साथ नहीं रही. वो ओल्ड गार्ड के फेवर में रही. केरल में भी खरगे चला लेते लेकिन अंत में राहुल ने जमीनी नेता वीडी सतीशन को सीएम बना दिया. पर किस काम के सीएम. होम मिनिस्ट्री रमेश चेन्नीथला के पास चला गया। 

अगर संजय गांधी वाला एक भी गुण राहुल में होता ते इन नेताओं की मजाल थी कि बकार भी निकल पाता. ऊपर से जो नैरेटिव सेट करते हैं राहुल उसी का नाश करते हैं उनके नेता. जब पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को चीफ सेक्रेटरी बना दिया तो राहुल ने जम कर हमला बोला. बीजेपी-चुनाव आयोग को चोर बाजार बता दिया. जो जितना बड़ा चोर उसे उतना बड़ा इनाम. ये उनका सोशल मीडिया पोस्ट था. पर केरल में उन्हीं के सीएम ने वही काम किया जो सुवेंदु ने किया. मुख्य चुनाव अधिकारी रतन केलकर को अपना ही सेक्रेटरी बनाकर राहुल गांधी के मुंह पर तमाचा जड़ दिया. अब बीजेपी सवाल पूछ रही है. क्या केरल में कांग्रेस की जीत चुनाव अधिकारी के कारण हुई है? यहां तो राहुल गांधी के एसआईआर के सारे नैरेटिव पर उन्हीं की पार्टी ने पानी फेर दिया. ऐसी बेइज्जती किसी शीर्ष नेता की हुई है क्या. संजय गांधी होते तो सतीशन नप गए होते। 

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