Haryana News: हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, कर्मचारियों की विदेश यात्रा से जुड़े प्रतिबंध पर बैन को पूर्ण रूप से हटा दिया है। अदालत ने कहा कि सिर्फ सरकारी कर्मचारी होने के आधार पर किसी पूरे वर्ग को विदेश जाने से रोकना संवैधनिक कसौटी पर उचिक नहीं ठहराया जा सकता। आइए जानते हैं कि क्यों और कब प्रतिबंध लगाया गया था।
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विदेश यात्रा पर पूर्ण प्रतिबंध
आपको बता दें कि, हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार का आदेश अत्यधिक व्यापक था। अदालत के मुताबिक, सरकारी सेवा में होने के कारण नागरिकों के एक पूरे वर्ग की निजी विदेश यात्रा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना मनमाना है। न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ ने 27 अगस्त को दिए अपने आदेश में राज्य सरकार को एक नर्सिंग अधिकारी को पेशेवर परीक्षा के सिलसिले में ऑस्ट्रेलिया जाने की अनुमति देने का निर्देश दिया। अदालत ने इस मामले में विदेश यात्रा के अधिकार को नागरिकों के मौलिक अधिकारों से भी जोड़ा।
अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा का अधिकार
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। याचिकाकर्ता को सरकारी आदेश का हवाला देकर ऑस्ट्रेलिया जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि निजी विदेश यात्रा पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए सरकार द्वारा दिए गए कारण पर्याप्त नहीं थे।
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट
हरियाणा सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि विदेश यात्रा पर रोक स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी व्यवस्था थी। सरकार ने रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच मितव्ययिता तथा जनहित को इसका आधार बताया। सरकार के मुताबिक, यह फैसला परिस्थितियों को देखते हुए सरकारी खर्च और यात्राओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। उनके वकील ने बताया कि संबंधित नर्सिंग अधिकारी को पहले ही ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए वीजा मिल चुका था और वह वहां पेशेवर परीक्षा में शामिल होने की तैयारी कर रही थीं।
ऑस्ट्रेलिया में परीक्षा के लिए जाना था
याचिकाकर्ता की नियुक्ति 23 फरवरी 2021 को रोहतक स्थित पीजीआईएमएस में नर्सिंग अधिकारी के रूप में हुई थी। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के वीजा के लिए जनवरी 2026 में आवेदन किया था और निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने के बाद 29 मई को उन्हें वैध वीजा मिल गया। वह ऑस्ट्रेलियाई स्वास्थ्य व्यवसायी विनियमन एजेंसी और राष्ट्रीय बोर्ड की ओर से आयोजित ‘ऑब्जेक्टिव स्ट्रक्चर्ड क्लिनिकल एग्जामिनेशन’ यानी OSCE में शामिल होना चाहती थीं। इसका उद्देश्य पेशेवर अनुभव हासिल करना और उच्च योग्यता प्राप्त करना था।
छुट्टी के आवेदन पर भी नहीं हुई कार्रवाई
परीक्षा में शामिल होने के लिए नर्सिंग अधिकारी ने 18 अगस्त से अर्जित अवकाश का आवेदन किया था। लेकिन अधिकारियों ने 10 जून 2026 के सरकारी निर्देश का हवाला देते हुए उनके आवेदन पर विचार नहीं किया। इस आदेश के तहत सरकारी कर्मचारियों के अलावा बोर्ड, निगम और सार्वजनिक प्राधिकरणों से जुड़े कर्मचारियों को भी सितंबर 2026 तक निजी या आधिकारिक कारणों से विदेश यात्रा करने से रोका गया था। हालांकि, जरूरी चिकित्सा यात्रा को इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया था।
हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश पर उठाए सवाल
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि निजी विदेश यात्रा पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध और आदेश के घोषित उद्देश्य के बीच कोई तार्किक संबंध है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकार का कदम उसके बताए गए उद्देश्य की तुलना में बेहद असंगत था। अदालत ने साफ किया कि प्रशासनिक उद्देश्य हासिल करने के नाम पर नागरिकों के अधिकारों पर इस तरह व्यापक रोक नहीं लगाई जा सकती।
इस फैसले को हरियाणा के सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, खासकर उन कर्मचारियों के लिए जिन्हें निजी, शैक्षणिक या पेशेवर कारणों से विदेश यात्रा करनी है।
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