G7 Summit 2026: ट्रंप ने ठुकराया मैक्रों का G7 बैठक प्रस्ताव, ग्रीनलैंड और नाटो पर छिड़ा नया विवाद

क्या साल 2026 में दुनिया एक नए विभाजन की ओर बढ़ रही है? राष्ट्रपति ट्रंप ने न केवल मैक्रों के जी7 आपातकालीन बैठक के प्रस्ताव को खारिज किया, बल्कि ग्रीनलैंड को न सौंपने पर यूरोप के खिलाफ 'आर्थिक परमाणु बम' यानी भारी टैरिफ का ऐलान कर दिया है। नाटो का भविष्य अब दावोस की बर्फ में दब गया है।

G7 Summit 2026

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 21, 2026

G7 Summit 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच कूटनीतिक तल्खी अब सार्वजनिक रूप से सामने आ गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर चर्चा के लिए मैक्रों द्वारा प्रस्तावित आपातकालीन G-7 बैठक के निमंत्रण को सिरे से खारिज कर दिया है। वाशिंगटन डीसी में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने न केवल बैठक में शामिल होने से इनकार किया, बल्कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति के राजनीतिक स्थायित्व पर भी तीखा हमला बोला। ट्रंप ने कहा कि मैक्रों लंबे समय तक सत्ता में नहीं रहने वाले हैं, इसलिए उनके साथ ऐसी बैठक करने का कोई औचित्य नहीं है। अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा होने के अवसर पर ट्रंप का यह बयान यूरोप के साथ अमेरिका के बदलते समीकरणों को दर्शाता है।

सोशल मीडिया पर मैक्रों का संदेश और ग्रीनलैंड का विवादास्पद मुद्दा

इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर मैक्रों द्वारा भेजे गए एक निजी संदेश का स्क्रीनशॉट साझा किया। इस संदेश में मैक्रों ने ट्रंप को ‘दोस्त’ संबोधित करते हुए सीरिया और ईरान के मुद्दों पर सहमति जताई थी, लेकिन साथ ही ग्रीनलैंड को हासिल करने की अमेरिकी कोशिशों पर हैरानी और असहमति व्यक्त की थी। मैक्रों ने डावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक के तुरंत बाद पेरिस में एक विशेष G-7 शिखर सम्मेलन और डिनर का प्रस्ताव रखा था, जिसमें यूक्रेन, डेनमार्क और रूस को भी आमंत्रित करने की योजना थी। हालांकि, ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। जब उनसे पूछा गया कि वह ग्रीनलैंड के लिए किस हद तक जा सकते हैं, तो उन्होंने रहस्यमयी अंदाज में कहा, ‘आपको जल्द ही पता चल जाएगा।’

NATO पर ट्रंप की नाराजगी: निष्पक्षता और खर्च पर उठाया सवाल

बैठक को ठुकराने के साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर रक्षा गठबंधन ‘नाटो’ (NATO) को अपने निशाने पर लिया। उन्होंने दावा किया कि इतिहास में किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में उन्होंने नाटो के लिए सबसे अधिक योगदान दिया है, लेकिन अब अमेरिका इसके बदले निष्पक्ष व्यवहार चाहता है। ट्रंप की सबसे बड़ी चिंता नाटो पर होने वाला भारी अमेरिकी खर्च है। उन्होंने खुले तौर पर संदेह व्यक्त किया कि यदि भविष्य में अमेरिका को जरूरत पड़ी, तो क्या नाटो के अन्य सदस्य देश उसी तरह मदद के लिए आगे आएंगे जैसे अमेरिका हमेशा आता है। ट्रंप का यह रुख गठबंधन के भीतर भविष्य में आने वाली गहरी दरार का संकेत दे रहा है।

यूरोपीय संप्रभुता और अमेरिकी व्यापार नीतियों पर मैक्रों का पलटवार

दूसरी ओर, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने डावोस में अमेरिका की आर्थिक नीतियों और टैरिफ की धमकियों की कड़ी आलोचना की है। मैक्रों का मानना है कि वॉशिंगटन की मौजूदा व्यापार नीतियां यूरोप को आर्थिक रूप से कमजोर करने और उसे अपने अधीन करने का एक सोचा-समझा प्रयास हैं। उन्होंने अमेरिकी टैरिफ को ‘मूल रूप से अस्वीकार्य’ बताते हुए कहा कि इनका उपयोग क्षेत्रीय संप्रभुता के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। मैक्रों ने दुनिया भर में बढ़ती हिंसा और ‘तानाशाही की ओर बढ़ते रुझान’ पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, 2024 की तुलना में वैश्विक संघर्षों की संख्या बढ़ी है, जो अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा है।

बदलते वैश्विक समीकरण और कूटनीतिक अनिश्चितता

ट्रंप और मैक्रों के बीच का यह वाकयुद्ध केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रतिबिंब है। एक तरफ जहां अमेरिका ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत अपने हितों को सर्वोपरि रख रहा है और ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण चाहता है, वहीं फ्रांस और यूरोपीय संघ अपनी संप्रभुता बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका अपने टैरिफ के जरिए यूरोप को झुका पाएगा या मैक्रों और अन्य यूरोपीय नेता मिलकर एक वैकल्पिक वैश्विक रणनीति तैयार करेंगे।

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