G7 Oil Decision : डीजल संकट के बीच G7 का बड़ा कदम, बाजार में आएगा 100 मिलियन बैरल तेल

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच G7 देशों ने बड़ा कदम उठाया है। 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन भंडार जारी करने का फैसला किया गया है। इसका मकसद डीजल की आपूर्ति बढ़ाना और बाजार पर कीमतों का दबाव कम करना है। अब नजर इस फैसले के वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पर है।

G7 Oil Decision

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अक्टूबर 3, 2026

G7 Oil Decision : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे दुनिया भर के देश भारी आर्थिक दबाव में हैं। इस विकट स्थिति से जूझ रही दुनिया को राहत प्रदान करने के लिए जी7 (G7) देशों ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया है। जी7 के आधिकारिक ऐलान के अनुसार, आने वाले कुछ हफ्तों के भीतर वैश्विक बाजार में कुल 100 मिलियन यानी 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और डीजल रिलीज किया जाएगा, ताकि बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाई जा सके।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दबाव

इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा कूटनीतिक दबाव सबसे अहम कारण माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार यूरोपीय देशों से यह मांग कर रहे थे कि वे अपने रणनीतिक डीजल भंडार का खुलकर इस्तेमाल करें। अमेरिका ने यहाँ तक चेतावनी दी थी कि यदि यूरोप ने डीजल की आपूर्ति बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो अमेरिका खुद अपने देश से डीजल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बारे में कड़ा विचार कर सकता है। ट्रंप की इस आक्रामक नीति के बाद जी7 देशों को यह बड़ा कदम उठाना पड़ा।

चुनावों के बीच ट्रंप की रणनीति

अमेरिका में पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन की लगातार बढ़ती कीमतें इस समय वहां का सबसे बड़ा और संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बनी हुई हैं। आगामी 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर महंगाई को नियंत्रित करने का भारी राजनीतिक दबाव है। एपी-नॉर्क पोल के अनुसार, अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग इस समय अपने सबसे निचले स्तर पर है। हालांकि, ट्रंप का यह भी तर्क रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने के लिए तेल की कीमतों में थोड़ी तेजी आना एक व्यावहारिक कीमत है।

खाड़ी देशों का संकट बना कीमत बढ़ने की वजह

वैश्विक स्तर पर ईंधन के दाम बढ़ने के मुख्य रूप से दो बड़े कारण रहे हैं। पहला कारण यह है कि यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद रूस ने अपने डीजल के निर्यात पर सख्त रोक लगा दी है। हालांकि यूरोप सीधे तौर पर रूस से डीजल नहीं खरीदता, लेकिन तुर्की और लैटिन अमेरिका जैसे अन्य देश जो पहले रूस से ईंधन लेते थे, वे अब यूरोपीय बाजारों से ही डीजल खरीदने की होड़ में हैं। दूसरा कारण अमेरिका और ईरान के बीच गहराता तनाव है, जिसकी वजह से खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई में भारी रुकावट आई है और कई प्रमुख शिपिंग रूट ब्लॉक हो गए हैं।

जी7 देशों का साफ संदेश

कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने राष्ट्रपति ट्रंप से घरेलू कीमतें घटाने के लिए अमेरिकी डीजल के निर्यात पर तुरंत बैन लगाने की मांग की थी, लेकिन जी7 देशों की बैठक में यह स्पष्ट कर दिया गया कि कोई भी सदस्य देश आपसी स्तर पर ऊर्जा और ऊर्जा उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा। जी7 का मानना है कि ऐसे प्रतिबंध लगाने से वैश्विक बाजार में तनाव और अधिक बढ़ जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने भी स्पष्ट किया कि उनका देश कभी भी डीजल एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगाने वाला नहीं था और न ही भविष्य में ऐसा कोई इरादा है।

एनर्जी एक्सपर्ट्स की चेतावनी

इस बड़े फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए राइस यूनिवर्सिटी के प्रमुख एनर्जी एक्सपर्ट जिम क्रेन ने एक बड़ी चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा कि रणनीतिक स्टॉक रिलीज करने से उपभोक्ताओं को तात्कालिक रूप से थोड़ी राहत जरूर मिलेगी, लेकिन लंबी अवधि में यह काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है। इमरजेंसी स्टॉक खाली होने से भविष्य में आपातकालीन सुरक्षा कवर कम बचेगा और जब दोबारा इन भंडारों को भरना होगा, तब कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। दोहरी जंग के माहौल में इमरजेंसी रिजर्व खाली करना जोखिम भरा हो सकता है।

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