Election Commission RTI : सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत मिले जवाब से निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी के कामकाज को लेकर उठे विवाद की जानकारी सामने आई है। कैबिनेट सचिवालय ने निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से भेजी गई शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई नहीं की। सचिवालय का तर्क था कि शिकायतें आयुक्तों ने व्यक्तिगत हैसियत से भेजी थीं और निर्वाचन आयोग की ओर से कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली थी।
29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को भेजे गए थे पत्र
आरटीआई कार्यकर्ता कमोडोर (सेवानिवृत्त) लोकेश के. बत्रा को मिले दस्तावेजों के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। शिकायतें वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज से संबंधित थीं। गर्ग को मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने 2 सितंबर 2024 से निर्वाचन आयोग में पदस्थ किया था।

कार्य आवंटन के आदेश को लेकर विवाद
रिपोर्ट के अनुसार, विवाद निर्वाचन आयोग के भीतर कार्य आवंटन से जुड़े एक आदेश के बाद शुरू हुआ। आरोप था कि मनीष गर्ग ने आयोग या संबंधित अधिकारियों से चर्चा किए बिना वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्तों, उप निर्वाचन आयुक्तों, महानिदेशकों और समकक्ष अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे में बदलाव करने का आदेश जारी किया। शिकायतकर्ताओं का कहना था कि ऐसे बदलावों से पहले आयोग की मंजूरी लेने के निर्देश दिए गए थे।
मतदाता सूची से जुड़े अधिकारों पर भी उठे सवाल
इससे पहले प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि कार्य आवंटन के आदेश से मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और रिकॉर्ड अपडेट करने की शक्तियां राज्य स्तर के अधिकारियों से हटकर आयोग के स्तर पर केंद्रित हो सकती थीं। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को बयान जारी कर कहा था कि दोनों आयुक्तों के निर्देश के बाद संबंधित आदेश लागू नहीं किए गए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि शिकायतें प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारी से जुड़ी थीं, न कि नीति या आईटी विभाग से।

कैबिनेट नोट में कार्रवाई को लेकर क्या तर्क दिया गया?
आरटीआई के जवाब में शामिल कैबिनेट नोट के मुताबिक, 3 अगस्त को तैयार मसौदे में इस मामले पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त की राय लेने का सुझाव दिया गया था। अगले दिन तैयार एक अन्य नोट में कहा गया कि आयोग की ओर से आधिकारिक सूचना मिले बिना शिकायतों पर कार्रवाई करना संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता है। सचिवालय ने आयोग की स्वतंत्रता और कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त कामकाज को भी अपने तर्क का आधार बनाया।
निर्वाचन आयुक्तों ने अधिनियम के उल्लंघन का लगाया आरोप
दस्तावेजों के अनुसार, संधू और जोशी ने आरोप लगाया कि कार्य आवंटन में बदलाव संबंधित अधिकारियों से चर्चा या आयोग की मंजूरी के बिना किया गया। उनका कहना था कि इस संबंध में पहले भी मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे। दोनों आयुक्तों ने इस कार्रवाई को स्थापित परंपराओं के विपरीत बताते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का उल्लंघन बताया।

फाइल नहीं मिलने का भी उठाया गया मुद्दा
निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी ने कथित तौर पर कहा कि प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगने पर उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। शिकायत में इसे प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर समस्या के रूप में उठाया गया। दूसरी ओर, कैबिनेट सचिवालय के नोट में कहा गया कि मनीष गर्ग अब निर्वाचन आयोग के अधिकारी हैं, इसलिए उनके कामकाज और आचरण की निगरानी आयोग के नियमों के तहत होनी चाहिए।
कानून में सर्वसम्मति और बहुमत का प्रावधान
कैबिनेट नोट में अधिनियम की धारा 18 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि आयोग के कामकाज से जुड़े फैसले जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए। मतभेद होने पर निर्णय बहुमत के आधार पर किया जा सकता है। सचिवालय ने दोनों आयुक्तों को शिकायत मिलने की पावती भेजने और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को इसकी जानकारी देने का सुझाव दिया। दस्तावेजों के मुताबिक, संबंधित मसौदा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव और स्थापना अधिकारी को भी रिकॉर्ड के लिए भेजा गया था।
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