El Nino 2026: अल नीनो का भारत पर असर, बढ़ सकती है भीषण गर्मी और महंगाई की मार

मौसम विशेषज्ञों ने 'अल नीनो' के कारण इस वर्ष अटलांटिक तूफान सीजन के शांत रहने का अनुमान लगाया है। हालांकि, भारत के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। अल नीनो के प्रभाव से देश में गर्मी लंबी खिंच सकती है और मानसून में सामान्य से कम बारिश की आशंका है, जिससे कृषि पैदावार घटने और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने का खतरा बढ़ गया है।

El Nino 2026

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

जून 2, 2026

El Nino 2026: यूएस नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मौसम विशेषज्ञों ने इस वर्ष अटलांटिक तूफान सीजन के सामान्य से शांत रहने का पूर्वानुमान जताया है। NOAA के अनुसार, इस सीजन में तूफानी गतिविधियों के सामान्य से कम रहने की संभावना 55 प्रतिशत है, जबकि सामान्य से अधिक होने की आशंका मात्र 10 प्रतिशत है। इस शांत मौसम के पीछे मुख्य कारक ‘अल नीनो’ को माना जा रहा है। अटलांटिक तूफान सीजन आधिकारिक तौर पर जून की शुरुआत से 30 नवंबर तक चलता है, जिसमें सितंबर का मध्य तूफानी गतिविधियों के लिहाज से सबसे संवेदनशील और चरम समय माना जाता है।

वैश्विक मौसमी चक्र और तापमान का प्रभाव

बताते चले कि, अल नीनो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाली एक चक्रीय वृद्धि है। यह मौसमी घटना आम तौर पर हर 2 से 7 वर्षों के अंतराल पर घटित होती है और 9 से 12 महीने तक सक्रिय रह सकती है। अल नीनो अपने सक्रिय चरण के दौरान न केवल वैश्विक औसत तापमान को बढ़ा देती है, बल्कि दुनिया भर के रेन सिस्टम (वर्षा तंत्र) में भी गंभीर व्यवधान पैदा करती है, जिसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, सूखे और भीषण लू (हीटवेव) का खतरा बढ़ जाता है।

वायुमंडलीय बदलाव और तूफानों पर असर

वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली हवाएं या तो कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं। इसके परिणामस्वरूप, प्रशांत महासागर का गर्म पानी वापस पूर्व की ओर अमेरिका के तटों की ओर बढ़ने लगता है। यह घटना अटलांटिक महासागर में तूफानी गतिविधियों को कम करने का काम करती है, जबकि इसके विपरीत, यह प्रशांत महासागर में तूफानों की संख्या और तीव्रता को काफी बढ़ा देती है। इसका विपरीत रूप ‘ला नीना’ है, जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से ठंडा हो जाता है।

वैश्विक जलवायु असंतुलन और पर्यावरणीय चुनौतियां

यद्यपि अल नीनो की शुरुआत प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इसके व्यापक प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किए जाते हैं। इस मौसमी घटना के कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका तथा अमेजन बेसिन के क्षेत्रों में भीषण गर्मी और जंगलों में आग (wildfires) लगने का खतरा बढ़ जाता है। वहीं, अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिल सकती हैं, जबकि उत्तरी अमेरिका के बड़े भू-भाग में असामान्य रूप से अधिक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की खाद्य सुरक्षा और मानसून पर संकट

भारत पर अल नीनो का प्रभाव विशेष रूप से चिंताजनक माना जा रहा है। इसके कारण देश में गर्मी का मौसम लंबा खिंच सकता है। सबसे गंभीर प्रभाव मानसून पर पड़ने की आशंका है, जहाँ सामान्य से कम बारिश होने से फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। कृषि उत्पादन में इस कमी का सीधा असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे महंगाई बढ़ने की संभावना है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में पहले से ही तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, ऐसे में अल नीनो का आगमन देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।