इकोनॉमिस्ट की चेतावनी: ‘युद्ध 40 दिन से ज्यादा चला तो…’ खाद्य कीमतें 6 महीने के हाई पर पहुंच सकती हैं

 नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में युद्ध (Middle East War) का असर लगभग हर देश में देखने को मिला है. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग के चलते होर्मुज बंद होने से पैदा हुए ग्लोबल तेल संकट (Oil Crisis) ने पाकिस्तान, बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका समेत अन्य देशों की चिंता बढ़ा दी. संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) फूड प्राइस इंडेक्स के आकंड़े देखें, तो युद्ध के चलते दुनिया में खाने-पीने की चीजों के दाम छह महीने के हाई (Global Food Price Surge) पर पहुंच गए हैं।  आने वाले महीनों में बढ़ेगी टेंशन!  मार्च महीने में वैश्विक स्तर पर खाने-पीने

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Published On :

अप्रैल 5, 2026

 नई दिल्ली

मिडिल ईस्ट में युद्ध (Middle East War) का असर लगभग हर देश में देखने को मिला है. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग के चलते होर्मुज बंद होने से पैदा हुए ग्लोबल तेल संकट (Oil Crisis) ने पाकिस्तान, बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका समेत अन्य देशों की चिंता बढ़ा दी. संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) फूड प्राइस इंडेक्स के आकंड़े देखें, तो युद्ध के चलते दुनिया में खाने-पीने की चीजों के दाम छह महीने के हाई (Global Food Price Surge) पर पहुंच गए हैं। 

आने वाले महीनों में बढ़ेगी टेंशन! 
मार्च महीने में वैश्विक स्तर पर खाने-पीने की चीजों की कीमतें सितंबर 2025 के बाद से हाई लेवल पर पहुंच गईं. इससे आने वाले महीनों में किराने पर खर्च और उनके बिलों की स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा हुई हैं।  एफएओ के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी हुई है, जो ग्लोबल फूड मार्केट में महंगाई के बढ़ते दबाव का संकेत है     .

जरूरी चीजों के मूल्य का आकलन करने वाला मानक FAO Food Price Index बीते मार्च महीने में औसतन 128.5 अंक रहा, जो फरवरी से 2.4% और वार्षिक आधार पर 1% का इजाफा दर्शाता है. इसके पीछे बड़े कारण की बात करें, तो खासतौर पर वेस्ट एशिया में जियो-पॉलिटिकल टेंशन के कारण बढ़ती ऊर्जा कीमतें, उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित होना है।

FAO के चीफ इकोनॉमिस्ट मैक्सिमो टोरेरो का कहना है कि मिडिल ईस्ट जंग शुरू होने के बाद से कीमतों में जो वृद्धि हुई है, उसका सबसे बड़ा कारण तेल की ऊंची कीमतें हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का फूड सिस्टम पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। 

खाद्य मंहगाई (Food Inflation) के पीछे के कारणों की बात करें,तो कच्चे तेल की हाई कीमतों से ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ती है. इसके साथ ही बायोफ्यूल की डिमांड में भी इजाफा देखने को मिलता है और इससे वनस्पति तेल जैसी वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं. फर्टिलाइजर्स पर असर एक बड़ी चिंता का विषय है, जो किसानों के बुवाई प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। 

गेहूं और मक्का की कीमतों में इजाफा 
वैश्विक स्तर पर फूड प्राइस में बढ़ोतरी के बारे में रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख रूप से खाद की बढ़ती लागत के चलते गेहूं की कीमतों में ग्लोबली 4.3% की वृद्धि हुई, तो एथेनॉल की डिमांड मजबूत होने से मक्का का भाव बढ़ा है। 

इसके अलावा वनस्पति तेल की कीमतों में सबसे तेज इजाफा देखने को मिला है, जो मासिक आधार पर 5.1% है. इसके अलावा सालाना आधार पर देखें, तो 13.2% की बढ़ोतरी देखने को मिली है. ये क्रूड प्राइस और बायोफ्यूल की डिमांड बढ़ने के चलते रही. मीट की कीमतों में 1% की वृद्धि हुई. डेयरी प्रोडक्ट्स की कीमतों में 1.2%, जबकि चीनी की कीमतों में 7.2% का उछाल आया। 

इकोनॉमिस्ट ने दी चेतावनी
एफएओ ने खाद्य सप्लाई के लिए संभावित जोखिमों की चेतावनी भी दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक गेहूं उत्पादन 820 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.7% कम है. इसके साथ ही इकोनॉमिस्ट टोरेरो ने वार्निंग देते हुए कहा कि मिडिल ईस्ट में मौजूदा संघर्ष 40 दिनों से अधिक समय तक चलता है, तो इसका वास्तविक प्रभाव बाद में देखने को मिल सकता है। 

उन्होंने कहा कि किसान खाद का इस्तेमाल कम कर सकते हैं, बुवाई कम कर सकते हैं या कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं. ये ऐसे फैसले हैं, जिनसे आने वाले महीनों में पैदावार कम हो सकती है और आपूर्ति सीमित हो सकती है. टोरेरो की मानें, तो फिलहाल फूड प्राइस में जो तेजी देखने को मिली है, वो डराने वाली नहीं है, लेकिन इन क्षेत्रों में लगातार दबाव वैश्विक स्तर पर खाद्य लागत में बड़ी वृद्धि का कारण बन सकता है। 

 

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