Ebola Outbreak : विश्व समुदाय पर एक बार फिर से बेहद गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट का खतरा तेजी से मंडराने लगा है। इस समय अफ्रीकी महाद्वीप के देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के नागरिक इबोला वायरस के एक नए और अत्यधिक घातक रूप (स्ट्रेन) का सामना कर रहे हैं। कांगो में इस जानलेवा वायरस के कारण अब तक 100 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों संक्रमित मरीज अस्पतालों में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। कांगो की इस भयावह स्थिति ने वैश्विक स्तर पर लोगों को साल 2020 की कोरोना महामारी के उस खौफनाक दौर की याद दिला दी है।
डब्ल्यूएचओ ने बुलाई आपात बैठक
इबोला वायरस का यह नया स्ट्रेन कितना विनाशकारी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे लेकर वैश्विक आपातकाल की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही सदस्य देशों की एक तत्काल आपातकालीन बैठक बुलाई गई है, ताकि इस वायरस के प्रसार को रोकने के लिए समय रहते एक सटीक और प्रभावी रणनीति तैयार की जा सके। डब्ल्यूएचओ के इस कड़े कदम के बाद से दुनिया भर में यह चर्चा बेहद तेज हो गई है कि क्या कोविड-19 महामारी की तरह एक बार फिर वैश्विक लॉकडाउन की स्थिति पैदा हो जाएगी, जिससे जनजीवन ठप हो सकता है।
‘बंडी बुगो’ स्ट्रेन की मृत्यु दर 50 फीसदी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैज्ञानिकों के मुताबिक, कांगो में कहर बरपा रहा यह नया स्ट्रेन ‘बंडी बुगो’ वायरस के नाम से जाना जा रहा है। यह पहले के किसी भी इबोला स्ट्रेन से मेल नहीं खाता और पूरी तरह से नया है। क्योंकि यह वायरस एकदम नया है, इसलिए वर्तमान में चिकित्सा विज्ञान के पास इसकी कोई प्रामाणिक वैक्सीन (टीका) या शत-प्रतिशत असरदार इलाज उपलब्ध नहीं है। कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस नए स्ट्रेन की मृत्यु दर लगभग 50 प्रतिशत है, जिसका सीधा मतलब यह है कि इस वायरस से संक्रमित होने वाले हर दो मरीजों में से एक की मौत निश्चित है।
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल लागू
डब्ल्यूएचओ द्वारा इसे ‘अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित किए जाने का सीधा अर्थ है कि यह घातक बीमारी अब केवल अफ्रीका महाद्वीप तक सीमित नहीं रहने वाली है। हवाई यात्राओं और वैश्विक कनेक्टिविटी के कारण यह संक्रमण बहुत तेजी से दूसरे महाद्वीपों और देशों में भी फैल सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता तब और ज्यादा बढ़ गई जब कांगो के पड़ोसी देश युगांडा में भी इस वायरस के कुछ पुष्ट मामले सामने आए। दो देशों में पैर पसारने के बाद यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भी ज्यादा संवेदनशील और खतरनाक हो गई है।
पूर्वी कांगो के मेडिकल सेंटर से हुई शुरुआत
प्रशासनिक और चिकित्सकीय रिपोर्टों के अनुसार, इस जानलेवा वायरस के फैलने की शुरुआत साल 2026 के शुरुआती महीनों में पूर्वी कांगो के एक स्थानीय मेडिकल सेंटर से हुई थी। वहां कार्यरत एक स्टाफ नर्स सबसे पहले इस वायरस की चपेट में आई थी। चूंकि इस नए स्ट्रेन के शुरुआती लक्षण सामान्य मलेरिया और टाइफाइड बुखार जैसे ही थे, इसलिए स्थानीय डॉक्टर समय पर इसकी सही पहचान करने में पूरी तरह विफल रहे। सही इलाज न मिलने के कारण कुछ ही दिनों में उस नर्स की असमय मृत्यु हो गई और उसके अंतिम संस्कार के दौरान यह संक्रमण अन्य लोगों में ट्रांसफर हो गया।
शरीर के तरल पदार्थों से फैलता है इबोला
इबोला वायरस मुख्य रूप से किसी संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले तरल पदार्थों जैसे खून, पसीना, लार, थूक और उल्टी के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। मृत नर्स के अंतिम संस्कार के समय उसके परिजनों और रिश्तेदारों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत उसके शरीर को छुआ था, जिससे यह संक्रमण उन सभी में फैल गया और फिर उनके माध्यम से पूरे समाज में फैल गया। डॉक्टरों द्वारा इसे शुरुआती दौर में एक सामान्य बीमारी समझने की लापरवाही का खामियाजा यह हुआ कि मरीजों का इलाज करने वाले कई डॉक्टर और नर्स भी खुद इसका शिकार बन गए।
इबोला नदी से पड़ा नाम
इबोला वायरस का इतिहास दशकों पुराना है; इसका सबसे पहला मामला साल 1976 में अफ्रीका की इबोला नदी के पास सामने आया था, जिसके नाम पर ही इस वायरस का नामकरण हुआ। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, इस वायरस का प्राकृतिक स्रोत ‘फ्रूट बैट’ यानी फल खाने वाले चमगादड़ माने जाते हैं। अफ्रीका के कई ग्रामीण हिस्सों में आज भी जंगली जानवरों का मांस (बुशमीट) खाने की एक पुरानी परंपरा है, जिसे इस वायरस के इंसानों तक पहुंचने का मुख्य जरिया माना जाता है। इससे पहले साल 2014 में इबोला का सबसे भीषण प्रकोप देखा गया था, जब 28,000 लोग संक्रमित हुए थे और 11,000 मौतें हुई थीं।
भारत में अभी तक एक भी मामला नहीं
भारतीय नागरिकों के नजरिए से फिलहाल सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि देश में इस नए इबोला वायरस का एक भी संदिग्ध या पुष्ट मामला सामने नहीं आया है। इसके बावजूद, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एहतियात के तौर पर देश के सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर थर्मल स्कैनिंग और निगरानी को कड़ा कर दिया है। विशेष रूप से अफ्रीकी देशों की यात्रा करके भारत लौट रहे यात्रियों की सघन पहचान की जा रही है और उनकी विस्तृत ट्रैवल हिस्ट्री जांची जा रही है, ताकि किसी भी संदिग्ध मरीज को तुरंत आइसोलेट (अलग) करके देश को सुरक्षित रखा जा सके।
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