Domestic Violence Rate : नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) 2023-24 की रिपोर्ट जारी होने के बाद देश के स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि कई क्षेत्रों में सकारात्मक सुधार दर्ज किया गया है, जबकि कुछ नई चुनौतियां भी उभरकर सामने आई हैं। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ी है, घरेलू हिंसा और बाल विवाह में कमी आई है, लेकिन मोटापे की समस्या और शिशु पोषण से जुड़े मुद्दे चिंता का विषय बने हुए हैं।
महिलाओं में बढ़ा मोटापा, स्वास्थ्य पर बढ़ी चिंता
रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में मोटापे की दर पिछले सर्वेक्षण की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत बढ़ गई है। यह संकेत देता है कि बदलती जीवनशैली, खानपान की आदतें और शारीरिक गतिविधियों में कमी स्वास्थ्य पर असर डाल रही हैं। कई राज्यों में महिलाओं में मोटापे की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक दर्ज की गई है, जिससे भविष्य में मधुमेह, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
घरेलू हिंसा और बाल विवाह में आई कमी
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि देश में घरेलू हिंसा के मामलों में गिरावट दर्ज की गई है। पहले जहां 29.2 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार थीं, अब यह आंकड़ा घटकर 22.3 प्रतिशत रह गया है। इसी तरह बाल विवाह के मामलों में भी कमी देखी गई है। बाल विवाह की दर 23.3 प्रतिशत से घटकर 20.1 प्रतिशत हो गई है, जो सामाजिक जागरूकता और सरकारी प्रयासों का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है।
रोजगार और डिजिटल पहुंच में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी में भी सुधार देखने को मिला है। कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर 30.8 हो गया है, जबकि पिछले सर्वे में यह 25.4 प्रतिशत था। इसके साथ ही महिलाओं के बीच इंटरनेट उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब 64.3 प्रतिशत महिलाएं इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही हैं, जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग दोगुना है। यह डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं और मातृत्व से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी की दर बढ़कर 54.1 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो एक रिकॉर्ड स्तर है। वहीं नवजात शिशुओं को जन्म के बाद शुरुआती छह महीनों तक केवल स्तनपान कराने की दर में गिरावट आई है। यह आंकड़ा पहले 63.7 प्रतिशत था, जो अब घटकर 55.8 प्रतिशत रह गया है। विशेषज्ञ इसे शिशु स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय मान रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं में हुआ उल्लेखनीय सुधार
देश में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में भी महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की गई है। अब 98.3 प्रतिशत घरों तक बिजली पहुंच चुकी है, जबकि 96.5 प्रतिशत परिवारों को स्वच्छ पेयजल की सुविधा मिल रही है। इसके अलावा महिलाओं के संपत्ति अधिकारों में भी सुधार हुआ है। वर्तमान में 18.8 प्रतिशत परिवारों में महिलाओं के नाम पर जमीन या मकान का स्वामित्व दर्ज है, जो पिछले सर्वे के मुकाबले अधिक है।
परिवार नियोजन और पोषण के मोर्चे पर चुनौतियां
हालांकि परिवार नियोजन के आधुनिक तरीकों को अपनाने वाली महिलाओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा 56.4 प्रतिशत से घटकर 52.7 प्रतिशत पर पहुंच गया है। दूसरी ओर, बच्चों में कुपोषण से जुड़े कुछ संकेत बेहतर हुए हैं। नाटेपन से प्रभावित बच्चों का प्रतिशत 35.5 से घटकर 29.3 हो गया है, जो एक सकारात्मक बदलाव है। फिर भी छह महीने से दो वर्ष तक की आयु के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही संतुलित और पर्याप्त आहार मिल पा रहा है।
राज्यों के बीच दिखा बड़ा अंतर
बाल विवाह के मामलों में केरल सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला राज्य रहा, जहां केवल 2.9 प्रतिशत मामले दर्ज हुए। इसके विपरीत पश्चिम बंगाल और बिहार में यह समस्या अधिक देखी गई। घरेलू हिंसा के मामलों में हिमाचल प्रदेश सबसे सुरक्षित राज्य रहा, जबकि बिहार में सबसे अधिक महिलाएं वैवाहिक हिंसा से प्रभावित पाई गईं। मोटापे के मामले में आंध्र प्रदेश, सिक्किम और केरल शीर्ष पर रहे, जबकि मेघालय और झारखंड में इसकी दर सबसे कम रही।
WHO रिपोर्ट ने भी जताई चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं ने अपने जीवन में कभी न कभी पार्टनर द्वारा मानसिक, आर्थिक या यौन हिंसा का सामना किया है। रिपोर्ट बताती है कि 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की हर पांचवीं महिला किसी न किसी रूप में ऐसी हिंसा से प्रभावित हुई है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि सामाजिक सुधार के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने की दिशा में अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।
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