
Jantar Mantar Protest : दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 10 अक्टूबर के मार्च की अनुमति नहीं देने और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के फैसले का बचाव किया है। पुलिस का कहना है कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने, संभावित हिंसा रोकने और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए उठाया गया था।
अवमानना नोटिस से राहत मांग रही दिल्ली पुलिस
पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से अवमानना नोटिस से मुक्त करने का अनुरोध किया है। यह मामला सार्वजनिक परिवहन सेवाओं से संबंधित न्यायालय के निर्देशों के कथित उल्लंघन से जुड़ा है। कमिश्नर के मुताबिक, 10 अक्टूबर को की गई कार्रवाई तत्कालीन परिस्थितियों, खुफिया सूचनाओं और संभावित खतरे के आकलन पर आधारित थी।

240 से अधिक पुलिसकर्मियों के घायल होने का दावा
हलफनामे में 20 जुलाई को NEET-UG पेपर लीक के मुद्दे पर निकाले गए ‘चलो संसद’ मार्च का भी उल्लेख है। पुलिस ने इस मार्च को अनधिकृत बताते हुए दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान 240 से अधिक पुलिस अधिकारी और कर्मचारी घायल हुए थे। पुलिस ने अपने आरोपों के समर्थन में तस्वीरों, वीडियो और अन्य साक्ष्यों का हवाला दिया है।
जून में दिए आश्वासन के उल्लंघन का आरोप
दिल्ली पुलिस के अनुसार, CJP ने जून में एक प्रदर्शन के लिए लिखित आश्वासन दिया था कि कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहेगा, इसमें एक हजार से अधिक लोग शामिल नहीं होंगे और पूर्व अनुमति के बिना संसद की ओर मार्च नहीं निकाला जाएगा। पुलिस का आरोप है कि 20 जुलाई को इन शर्तों का उल्लंघन किया गया। इसी घटना को अक्टूबर के मार्च पर रोक लगाने के फैसले का आधार बताया गया है।

अक्टूबर के प्रदर्शनों से यातायात प्रभावित होने की बात
पुलिस कमिश्नर ने हलफनामे में 6, 7 और 8 अक्टूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शनों का भी जिक्र किया है। पुलिस के मुताबिक, इन प्रदर्शनों के दौरान मध्य दिल्ली में कई घंटों तक यातायात बाधित रहा। इससे छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और अन्य यात्रियों को परेशानी हुई। पुलिस का दावा है कि जाम के कारण कुछ लोग ट्रेन और फ्लाइट तक नहीं पकड़ सके।
पुलिसकर्मियों से दुर्व्यवहार के भी आरोप
हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि कुछ प्रदर्शनों के दौरान प्रतिभागियों का व्यवहार आक्रामक हो गया था। पुलिस के अनुसार, कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया और महिला अधिकारियों के साथ बदसलूकी की। इन घटनाओं में एक दर्जन से अधिक पुलिसकर्मियों के घायल होने का दावा भी किया गया है। पुलिस ने इन्हीं परिस्थितियों को संभावित टकराव की आशंका से जोड़ा है।

दिल्ली की सुरक्षा और आम लोगों की आवाजाही का हवाला
अनुराग कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में संसद, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन और राजनयिक मिशन जैसे संवेदनशील संस्थान मौजूद हैं। ऐसे में पुलिस की जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति की रक्षा और यातायात सामान्य बनाए रखने की भी है। पुलिस का तर्क है कि विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा नहीं होना चाहिए।
हिरासत में लिए गए लोगों को कुछ घंटों में छोड़ने का दावा
पुलिस ने कार्रवाई के समर्थन में दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 और BNSS की धारा 163 का उल्लेख किया। हलफनामे के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को कुछ घंटों के भीतर छोड़ दिया गया और उन्हें जेल या पुलिस लॉकअप में नहीं रखा गया। पुलिस ने भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी दावा किया। कमिश्नर के मुताबिक, कार्रवाई का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि संभावित अव्यवस्था को रोकना था। मामले में अंतिम निष्कर्ष न्यायालय की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।
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