CJP Protest: FIR वापसी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, गंभीर अपराधियों को राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में केवल समझौते या सरकार की इच्छा के आधार पर FIR वापस नहीं ली जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून का पालन सर्वोपरि रहेगा। आखिर किन मामलों में राहत मिलेगी और किनमें नहीं? जानिए फैसले की पूरी जानकारी।

CJP Protest

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अगस्त 3, 2026

CJP Protest:  दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित नीट पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर दर्ज एफआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली सरकार सहित अन्य राज्य सरकारें यदि उचित समझें तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने या समाप्त करने का निर्णय ले सकती हैं। अदालत की इस टिप्पणी को उन छात्रों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिन पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान विभिन्न मामलों में एफआईआर दर्ज की गई थी। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में रहेगा।

अदालत ने अपने पुराने आदेश पर दिया स्पष्टीकरण

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेशों का उल्लेख करते हुए एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। अदालत ने कहा कि जब उसने ‘आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रदर्शनकारियों’ का उल्लेख किया था, तो उसका आशय केवल उन व्यक्तियों से था जिनके खिलाफ हत्या जैसे गंभीर और संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य विरोध-प्रदर्शन के दौरान दर्ज एफआईआर या हल्के आरोपों के आधार पर किसी छात्र को गंभीर अपराधी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस स्पष्टीकरण से उन छात्रों को कानूनी राहत मिलने की संभावना बढ़ गई है, जिनके खिलाफ केवल प्रदर्शन से जुड़े मामले दर्ज हुए हैं।

राज्य सरकारों के पास कार्रवाई का विकल्प

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि संबंधित राज्य सरकारें अपने विवेक के आधार पर ऐसे मामलों की समीक्षा कर सकती हैं। यदि किसी छात्र के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं और मामला केवल प्रदर्शन या विरोध से जुड़ा है, तो सरकारें कानूनी प्रक्रिया के तहत एफआईआर वापस लेने या मुकदमे समाप्त करने पर विचार कर सकती हैं। अदालत ने इस संबंध में राज्यों के अधिकारों को स्पष्ट करते हुए किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं लगाई, बल्कि कानूनी विकल्प उपलब्ध होने की बात कही।

केंद्र सरकार ने समाधान का भरोसा दिलाया

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि सरकार इस पूरे मामले का शांतिपूर्ण और संतुलित समाधान चाहती है। उन्होंने कहा कि छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर संभवतः कहीं न कहीं संवाद की कमी या गलतफहमी की स्थिति बनी थी। उनके अनुसार, जिन छात्रों का कोई गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके मामलों की समीक्षा करने और उचित समाधान निकालने के लिए सरकार तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार छात्रों के साथ संवाद के माध्यम से इस मुद्दे को सुलझाने की इच्छुक है।

संवाद के जरिए समाधान पर जोर

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि सरकार चाहती है कि छात्र बातचीत का रास्ता अपनाएं। उनका कहना था कि यदि छात्र और सरकार आपसी संवाद के जरिए समाधान तलाशेंगे तो विवाद का शांतिपूर्ण अंत संभव है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार उन मामलों में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है, जहां गंभीर आपराधिक तत्व शामिल नहीं हैं। इस दौरान उन्होंने यह भी दोहराया कि सरकार छात्रों की चिंताओं को समझने और उचित कानूनी समाधान निकालने के पक्ष में है।

मामले को अनावश्यक रूप से बढ़ाने पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि कुछ ऐसे तत्व हैं जो इस विवाद को लगातार जीवित रखना चाहते हैं। उनके अनुसार, कुछ लोग इस मुद्दे को शांत होने देने के बजाय लगातार राजनीतिक या अन्य कारणों से इसे आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि इसी कारण सरकार को कानूनी सलाह और आगे की कार्रवाई के संबंध में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है। उनका कहना था कि सरकार का उद्देश्य विवाद को बढ़ाना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर समाधान निकालना है।

छात्रों के लिए राहत की उम्मीद बढ़ी

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और केंद्र सरकार के रुख के बाद उन छात्रों के लिए राहत की उम्मीद बढ़ गई है, जिनके खिलाफ नीट पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के दौरान एफआईआर दर्ज की गई थी। हालांकि अंतिम फैसला संबंधित राज्य सरकारों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा, लेकिन अदालत के स्पष्टीकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सामान्य विरोध-प्रदर्शन में शामिल छात्रों को गंभीर अपराधियों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अब आगे की कार्रवाई राज्य सरकारों की समीक्षा, कानूनी प्रक्रिया और संबंधित मामलों की परिस्थितियों के आधार पर तय होगी।

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