बिहार के व्यापारी बंगाल से लीची खरीदकर महानगरों की मांग पूरी करने को मजबूर

मुजफ्फरपुर मुजफ्फरपुर के व्यापारी अपना कारोबार बचाने के लिए इस बार पश्चिम बंगाल से लीची खरीद रहे हैं। जिले में मौसम की मार और स्टिंक बग कीट के प्रकोप से बगानों में 30 फीसदी लीची भी नहीं बची है। किसान अपने बगान को देख हताश हैं तो जिले के दर्जनों बड़े व्यापारी बंगाल का रूख कर रहे हैं। दरअसल, यहां के किसानों से खरीदे गए लीची के बगान की हालत देख व्यापारी झांकने आना भी नहीं चाहते। यही कारण है कि जिले के कांटी, मीनापुर, बोचहां आदि प्रखंडों के दर्जनों व्यापारी बंगाल जाकर किसानों का लीची का बाग खरीद रहे

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Published On :

मई 10, 2026

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मुजफ्फरपुर

मुजफ्फरपुर के व्यापारी अपना कारोबार बचाने के लिए इस बार पश्चिम बंगाल से लीची खरीद रहे हैं। जिले में मौसम की मार और स्टिंक बग कीट के प्रकोप से बगानों में 30 फीसदी लीची भी नहीं बची है। किसान अपने बगान को देख हताश हैं तो जिले के दर्जनों बड़े व्यापारी बंगाल का रूख कर रहे हैं।

दरअसल, यहां के किसानों से खरीदे गए लीची के बगान की हालत देख व्यापारी झांकने आना भी नहीं चाहते। यही कारण है कि जिले के कांटी, मीनापुर, बोचहां आदि प्रखंडों के दर्जनों व्यापारी बंगाल जाकर किसानों का लीची का बाग खरीद रहे हैं।

बंगाल की लीची से पूरा करेंगे महानगरों का ऑर्डर
कांटी के लीची व्यापारी बबलू शाही ने बताया कि मुजफ्फरपुर से हर साल 50 टन से अधिक लीची बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई, लखनऊ समेत देश के विभिन्न शहरों में भेजते हैं। इस बार भी मंजर देख हमलोग उत्साहित थे। आज 30 फीसदी लीची भी नहीं दिख रही है। प. बंगाल में 15 मई से लीची की तुड़ाई शुरू होने लगती है, इसलिए हमारे साथ दर्जनों व्यापारी बंगाल आए हैं।

इस बार बंगाल से ही लीची खरीद महानगरों की मांग पूरी करेंगे। मुशहरी के व्यापारी संतू महतो ने बताया कि 12 एकड़ लीची का बाग खरीदा था। आज किसानों को पैसे देने लायक भी लीची नहीं है। उद्यान रत्न किसान भोलानाथ झा ने कहा कि लीची की हालत देख बाग में जाना छोड़ दिए हैं।

कमजोर फसल से दो लाख मजदूरों के रोजगार पर संकट
बिहार लीची एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने कहा कि मुजफ्फरपुर जिले में 15 हजार हेक्टेयर में लीची के बाग हैं। इससे हर साल सीजन में दो लाख से अधिक मजदूरों को रोजगार मिलता था। हर साल करीब 125 हजार टन लीची का उत्पादन होता है। फसल बर्बाद होने पर भी 70-80 हजार टन लीची मिल जाती थी। इस बार 25 से 30 हजार टन लीची उत्पादन भी मुश्किल है।

बताया कि जिले में छोटे-बड़े मिलाकर तीन हजार से अधिक बगान हैं। एक बगान में 25 से 50 मजदूरों को एक माह तक रोजगार मिलता था। वहीं, लीची प्रसोसेसिंग यूनिट के संचालक आलोक केडिया ने बताया कि लीची के सीजन में ग्रेड बी लीची का पल्प तैयार होता है। इसमें लीची की छिलाई में मजदूरों को काम मिलता है। इस बार फसल कमजोर होने से मजदूरों के रोजगार पर असर पड़ेगा। इसके आलवा ट्रांसपोटिंग तुड़ाई, गुच्छा बनाने में मजदूर को काम मिलता है।

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