बंगाल में वोटर लिस्ट पर संकट, मुस्लिम बहुल जिलों में नाम कटने का खतरा

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची को लेकर एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है। राज्य में शनिवार को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने वाली है, लेकिन करीब 60,06,675 मतदाताओं के नाम पर अभी भी असमंजस के बादल छाए हुए हैं। ये कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% हिस्सा हैं, जिनकी पात्रता की समीक्षा अब निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के बजाय सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग के वैधानिक अधिकारियों (EROs और AEROs) ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि उन्होंने पूरी सावधानी से दस्तावेजों की जांच कर लाखों नामों

Wrriten By :

Editor

Published On :

फ़रवरी 28, 2026

Advertisements
728x90 Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital.jpg

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची को लेकर एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है। राज्य में शनिवार को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने वाली है, लेकिन करीब 60,06,675 मतदाताओं के नाम पर अभी भी असमंजस के बादल छाए हुए हैं। ये कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% हिस्सा हैं, जिनकी पात्रता की समीक्षा अब निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के बजाय सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं।

निर्वाचन आयोग के वैधानिक अधिकारियों (EROs और AEROs) ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि उन्होंने पूरी सावधानी से दस्तावेजों की जांच कर लाखों नामों को मंजूरी दे दी थी। हालांकि आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो-ऑब्जर्वर्स द्वारा विसंगतियां बताए जाने के बाद इन स्वीकृत नामों को सिस्टम से रिवर्स कर दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि सुनवाई की अंतिम तिथि 14 फरवरी तक यह संख्या अचानक कुछ लाख से बढ़कर 60 लाख के पार पहुंच गई। एक अधिकारी ने बताया कि 11 फरवरी के बाद से माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने उन मामलों को भी वापस भेजना शुरू कर दिया जिन्हें पहले हरी झंडी मिल चुकी थी। इसमें एक सेवारत वरिष्ठ आईएएस अधिकारी का नाम भी शामिल बताया जा रहा है।
मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे ज्यादा मामले लंबित

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मतदाता सूची से नाम कटने या समीक्षा के दायरे में आने का सबसे ज्यादा असर अल्पसंख्यक बहुल जिलों में दिख रहा है। मुर्शिदाबाद में 11 लाख, मालदा में 8.28 लाख, दक्षिण 24 परगना में 5.22 लाख, उत्तर 24 परगना में 5 लाख, झारग्राम में 6,682 और कालिम्पोंग में 6,790 मामले लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के 530 न्यायिक अधिकारी इस सप्ताह से इन 60 लाख मतदाताओं के भाग्य का फैसला कर रहे हैं। जब तक ये अधिकारी नामों को मंजूरी नहीं देते, ये मतदाता आगामी विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे। अंतिम सूची में इनके नाम के आगे निर्णय के अधीन लिखा होगा, जिसे न्यायिक मंजूरी मिलने के बाद ही हटाया जाएगा।

निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में करीब 8,100 सूक्ष्म-प्रेक्षकों की नियुक्ति की थी, जो देश के किसी अन्य राज्य में नहीं किया गया। तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे चुनौती देते हुए आरोप लगाया है कि इन प्रेक्षकों ने वैधानिक अधिकारियों (EROs) के अधिकारों का अतिक्रमण किया है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग के अधिकारियों का तर्क है कि दस्तावेजों में भारी अनियमितताएं पाई गईं। आरोप है कि कई मामलों में AI-जनरेटेड वोटर आईडी और अवैध दस्तावेज अपलोड किए गए थे। एक रोल ऑब्जर्वर ने बताया कि पुरुषों के आवासीय प्रमाण के रूप में ICDS प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज दिए गए थे।

पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने स्थिति को अत्यंत अनिश्चित बताया है। उन्होंने कहा कि अदालती हस्तक्षेप और बार-बार की अपीलों के कारण न्यायिक अधिकारियों द्वारा संशोधन की यह अनूठी मिसाल बनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं की पात्रता पर सवाल उठना न केवल प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है, बल्कि यह चुनाव की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करता है। यदि इन 60 लाख लोगों में से एक बड़ा हिस्सा वोट देने से वंचित रह जाता है तो इसके चुनावी परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।

Leave a Comment

2