Bengal Election: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का सियासी पारा अब अपने उफान पर है। राज्य की सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी आक्रामक बिसात बिछाते हुए उम्मीदवारों की छठी सूची (Sixth List) जारी कर दी है। इस ताजा फेहरिस्त में सबसे अधिक चर्चा ‘कोलकाता पोर्ट’ विधानसभा क्षेत्र की हो रही है, जहां भाजपा ने राकेश सिंह को चुनावी रण में उतारकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अभेद्य दुर्ग में सेंधमारी के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं।
ममता बनर्जी के गढ़ कोलकाता पोर्ट में राकेश सिंह की उम्मीदवारी
बताते चले कि, बीजेपी द्वारा जारी की गई नई उम्मीदवरों की सूची में राकेश सिंह का नाम सबसे चौंकाने वाला माना जा रहा है. कोलकाता पोर्ट सीट ऐतिहासिक रूप से टीएमसी का सबसे मजबूत स्तंभ रही है। भाजपा ने यहाँ एक स्थानीय और जुझारू चेहरे पर भरोसा जताकर ‘बाहरी बनाम भीतरी’ के नैरेटिव को ध्वस्त करने का प्रयास किया है। राकेश सिंह की पहचान पोर्ट इलाके के श्रमिकों और व्यापारियों के बीच एक सक्रिय नेता के रूप में है। पार्टी का यह कदम दर्शाता है कि वह प्रत्येक विधानसभा सीट पर माइक्रो-लेवल (सूक्ष्म स्तर) पर मंथन कर उम्मीदवारों का चयन कर रही है।
पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा की त्रिकोणीय रणनीति
2026 का यह महाकुंभ भाजपा के लिए महज चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीतिक दिशा बदलने की एक बड़ी लड़ाई है। भाजपा की सेंधमारी की योजना मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिकी है। पहला, भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून-व्यवस्था को लेकर ममता सरकार की घेराबंदी। दूसरा, संदेशखाली जैसी घटनाओं के जरिए महिला वोट बैंक में विभाजन करना। और तीसरा, कोलकाता की शहरी सीटों पर ‘विकास और बदलाव’ के नारे के साथ मध्यम वर्ग को अपने पाले में लाना। भाजपा ‘सोनार बांग्ला’ और ‘मोदी की गारंटी’ के साथ-साथ नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जैसे मुद्दों को भी धार दे रही है।
तृणमूल कांग्रेस के सामने एंटी-इंकंबेंसी की चुनौती
एक तरफ जहाँ भाजपा आक्रामक है, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी 15 वर्षों की विरासत को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं। टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत ‘मा-माटी-मानुष’ का नारा और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाएं हैं, जिन्होंने ग्रामीण बंगाल में दीदी की पकड़ को मजबूत बनाए रखा है। हालांकि, 15 साल की सत्ता के बाद पैदा हुई प्रशासनिक थकान (Anti-incumbency) और स्थानीय नेताओं के खिलाफ जनता का आक्रोश ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। भाजपा इसी जन-असंतोष को वोट में तब्दील करने की फिराक में है।
क्या होगा ‘खेला’ या खिलेगा ‘कमल’?
पश्चिम बंगाल की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है। कोलकाता पोर्ट से राकेश सिंह का चयन यह साफ कर देता है कि इस बार मुकाबला ‘आर-पार’ का होगा। भाजपा का संगठनात्मक ढांचा जहाँ ध्रुवीकरण और विकास के मिश्रण के साथ आगे बढ़ रहा है, वहीं टीएमसी अपनी संगठनात्मक मजबूती और अल्पसंख्यक वोटों के भरोसे है। अब देखना यह होगा कि बंगाल की जनता ‘दीदी’ के नेतृत्व पर दोबारा मुहर लगाती है या भाजपा के ‘सोनार बांग्ला’ के सपने को चुनकर राज्य में सत्ता परिवर्तन की नई इबारत लिखती है।










