Baglamukhi Jayanti 2026: हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व है, जिनमें से आठवीं महाविद्या देवी बगलामुखी को शक्ति और स्तंभन की देवी माना जाता है। हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामुखी जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष, यह पावन पर्व आज 24 अप्रैल 2026, शुक्रवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
मान्यता है कि इसी दिन देवी बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था। उन्हें ‘पीताम्बरा’ और ‘ब्रह्मास्त्र विद्या’ के नाम से भी जाना जाता है। इनकी साधना से न केवल शत्रुओं का नाश होता है, बल्कि अदालती मामलों, वाद-विवाद और जीवन की बड़ी बाधाओं से भी मुक्ति मिलती है।
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बगलामुखी जयंती का महत्व

देवी बगलामुखी की पूजा विशेष रूप से नकारात्मक शक्तियों को दूर करने और शत्रुओं को परास्त करने के लिए की जाती है। ‘बगला’ शब्द संस्कृत के ‘वल्गा’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘लगाम’ या ‘नियंत्रित करना’। इसलिए, मां बगलामुखी शत्रुओं की वाणी और गति को नियंत्रित करने वाली अधिष्ठात्री देवी हैं। जो भक्त आज के दिन पूर्ण निष्ठा से व्रत और पूजन करते हैं, उन्हें हर कार्य में सफलता और सुरक्षा प्राप्त होती है।
पूजा के लिए सबसे उत्तम शुभ मुहूर्त
आज के दिन मां पीताम्बरा की आराधना के लिए कई विशेष मुहूर्त उपलब्ध हैं, जिनमें पूजा करना अत्यंत फलदायी माना गया है:
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:19 से 05:03 तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:53 से दोपहर 12:46 तक
अमृत काल: दोपहर 02:01 से 03:35 तक
सायाह्न सन्ध्या: शाम 06:52 से 07:57 तक
निशिता मुहूर्त (विशेष साधना के लिए): रात 11:57 से देर रात 12:41 तक
मां बगलामुखी की विशेष पूजन विधि
देवी बगलामुखी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में पीले रंग का विशेष प्रयोग किया जाता है:
शुद्धिकरण: प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध पीले वस्त्र धारण करें।
संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर मां के व्रत और विधिवत पूजा का संकल्प लें।
स्थापना: घर के ईशान कोण या मंदिर में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर मां बगलामुखी की प्रतिमा, चित्र या ‘बगलामुखी यंत्र’ स्थापित करें।
श्रृंगार और अर्पण: देवी को हल्दी का तिलक लगाएं। उन्हें पीले फूल, पीला फल (केला), पीले वस्त्र और चंदन अर्पित करें। देवी को पीली मिठाई या बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं।
दीप और मंत्र: घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं। हल्दी की माला से मां के सिद्ध मंत्रों का जाप करें।
कथा और आरती: पूजा के दौरान बगलामुखी व्रत कथा का श्रवण करें और अंत में कपूर या घी के दीपक से मां की आरती उतारें।
पारण: अष्टमी तिथि के समापन के पश्चात ही व्रत का पारण करना शास्त्रोक्त माना गया है।
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