
UP Election 2027: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। 31 अक्टूबर 2026 को रामपुर जेल से रिहा होने के कुछ ही मिनट बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट से आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को कथित दो पैन कार्ड मामले में जमानत मिली थी। लेकिन जेल से बाहर आते ही ईडी की कार्रवाई ने उनकी राजनीतिक वापसी की राह मुश्किल कर दी है।
इस घटनाक्रम का असर सिर्फ आजम खान तक सीमित नहीं रह सकता। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी की रणनीति और मुस्लिम नेतृत्व को लेकर भी नए सवाल खड़े हो गए हैं।
जौहर यूनिवर्सिटी मामले में ED की जांच

ईडी की कार्रवाई रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में कथित वित्तीय गड़बड़ियों की जांच से जुड़ी है। एजेंसी के मुताबिक, आयकर विभाग की रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी की इमारतों की लागत करीब 494.46 करोड़ रुपये बताई गई है। वहीं, जौहर ट्रस्ट के रिकॉर्ड में वित्त वर्ष 2013-14 से 2024-25 के बीच पूंजीगत खर्च 78.32 करोड़ रुपये दर्ज है।
इन दोनों आंकड़ों के बीच करीब 416.14 करोड़ रुपये का अंतर सामने आया है। ईडी इसी अंतर और निर्माण में इस्तेमाल हुए पैसों के स्रोत की जांच कर रही है। हालांकि, ये एजेंसी के आरोप और जांच के निष्कर्ष हैं। मामले में अंतिम फैसला अदालत को करना है।
पश्चिमी यूपी में आजम खान का प्रभाव, सपा के लिए क्यों अहम हैं?
आजम खान उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से समाजवादी पार्टी का बड़ा चेहरा रहे हैं। वह दस बार विधायक चुने जा चुके हैं और सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव की सरकार तक उनकी अहम भूमिका रही है। खासकर रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजम खान का अपना राजनीतिक प्रभाव रहा है। मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ और समर्थकों का नेटवर्क सपा के लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। अगर वह 2027 के चुनाव से पहले सक्रिय होकर पार्टी के लिए प्रचार कर पाते, तो पुराने समर्थकों को दोबारा जोड़ने में मदद मिल सकती थी। लेकिन ताजा गिरफ्तारी के बाद उनकी चुनावी भूमिका पर अनिश्चितता बढ़ गई है।

आजम खान की गैरमौजूदगी में ओवैसी को मिल सकता है मौका

आजम खान की राजनीतिक सक्रियता प्रभावित होने पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के लिए भी उत्तर प्रदेश में अपनी जगह मजबूत करने का अवसर बन सकता है। ओवैसी लगातार मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी का मुद्दा उठाते रहे हैं। अक्टूबर 2026 में रामपुर की एक रैली में ओवैसी ने अखिलेश यादव पर आरोप लगाया था कि समाजवादी पार्टी मुसलमानों का इस्तेमाल सिर्फ वोट के लिए करती है। ऐसे में अगर आजम खान सपा के मंच पर सक्रिय नहीं रह पाते हैं, तो ओवैसी को अपने इस आरोप को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने का मौका मिल सकता है।
अखिलेश यादव के सामने आजम खान के समर्थकों को जोड़ने की चुनौती
आजम खान की गिरफ्तारी के बाद अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके समर्थकों को समाजवादी पार्टी से जोड़े रखने की होगी। 22 अक्टूबर को रामपुर जेल में आजम खान से मुलाकात के बाद अखिलेश ने कहा था, ‘आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे।’ उनके इस बयान को आजम खान और उनके समर्थकों के प्रति भरोसा जताने के तौर पर देखा गया था।

बताया गया है कि आजम खान ने जेल में रहते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम भी सुझाए थे। इससे साफ है कि वह राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े रहने की कोशिश कर रहे थे।
सपा के मुस्लिम वोट बैंक पर कितना पड़ेगा असर?
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आजम खान की गिरफ्तारी समाजवादी पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है। पार्टी को एक तरफ उनके समर्थकों को साथ बनाए रखना होगा, तो दूसरी तरफ पश्चिमी यूपी में नए मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाने की रणनीति भी बनानी होगी। हालांकि, आजम खान की गिरफ्तारी का सीधा असर चुनावी नतीजों पर कितना पड़ेगा, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि उनकी राजनीतिक सक्रियता, सपा का संगठन और मुस्लिम मतदाताओं के बीच नेतृत्व का सवाल आगामी चुनाव में चर्चा का बड़ा विषय बन सकता है।











