Funeral of Khamenei: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन की खबर ने न केवल ईरान बल्कि पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। यह घटना मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) के इतिहास में एक बड़े युग के अंत का प्रतीक है। खामेनेई के जाने से इस संवेदनशील क्षेत्र में राजनीतिक अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं। ईरान की सड़कों पर इस समय गम और गुस्से का एक ऐसा सैलाब उमड़ा है, जिसने भविष्य की क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वैश्विक शक्तियां इस घटनाक्रम को युद्ध की नई लपटों के रूप में देख रही हैं।
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ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक
सर्वोच्च नेता के निधन के बाद ईरान सरकार ने देश की संप्रभुता और सम्मान को ध्यान में रखते हुए 40 दिनों के लंबे राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया है। इसके साथ ही, अगले सात दिनों के लिए सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की गई है। तेहरान की गलियों में जहां एक ओर सन्नाटा पसरा है, वहीं दूसरी ओर अपने नेता के प्रति अटूट विश्वास रखने वाले लोगों की आंखों में भारी गम और आक्रोश साफ देखा जा सकता है। शासन ने किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पूरे देश में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं।
तेहरान में उमड़ेगा जनसैलाब
इतिहास के पन्ने पलटें तो 1989 में अयातुल्ला खुमैनी के अंतिम संस्कार में करीब एक करोड़ लोग शामिल हुए थे। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, खामेनेई की अंतिम विदाई में भी उसी तरह के ऐतिहासिक हुजूम के उमड़ने की संभावना है। देश के कोने-कोने से लोग अपने प्रिय नेता को आखिरी बार देखने के लिए तेहरान पहुंच रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, उन्हें या तो राजधानी तेहरान में या फिर पवित्र धार्मिक नगरी मशहद में पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
मासूमों की मौत से भड़का आक्रोश
इस दुखद घटना का सबसे विचलित करने वाला पहलू हमले की भयावहता है। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए इस हमले में न केवल खामेनेई, बल्कि उनकी 14 महीने की मासूम नातिन और परिवार के कई अन्य सदस्यों की भी मृत्यु हो गई है। युद्ध की इस निर्मम तस्वीर ने आम जनता के भीतर बदले की आग को और भड़का दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी निर्दोष बच्चों और परिजनों की मौत की तीखी निंदा की जा रही है, जिससे यह संघर्ष अब एक भावनात्मक और संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है।
दुनियाभर में शिया समुदाय का प्रदर्शन
खामेनेई की मौत का असर ईरान की सीमाओं से बाहर भी देखने को मिल रहा है। भारत में कश्मीर से लेकर कर्नाटक तक शिया समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पाकिस्तान के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन इतने उग्र हो गए कि वहां सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पें और आगजनी की खबरें सामने आई हैं। वहीं, इराक की राजधानी बगदाद में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास की घेराबंदी करने की कोशिश की, जिसके बाद वहां भारी तनाव की स्थिति बनी हुई है।
मिडिल ईस्ट में युद्ध का दायरा तेजी से फैल रहा
इस घटनाक्रम के बाद मिडिल ईस्ट में युद्ध का दायरा तेजी से फैल रहा है। हिजबुल्लाह ने सीजफायर तोड़कर इजरायली ठिकानों पर मिसाइलों और ड्रोनों से भीषण हमले शुरू कर दिए हैं। दूसरी ओर, ब्रिटेन ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए अमेरिकी सेना को अपने सैन्य बेस इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। इन बदलती परिस्थितियों ने वैश्विक शक्तियों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है, जिससे आने वाले समय में मिडिल ईस्ट के सामरिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।










