Delhi Excise Policy 2026 : अरविंद केजरीवाल की बढ़ी मुश्किलें, समन की अवहेलना पर हाई कोर्ट का बड़ा एक्शन!

दिल्ली हाई कोर्ट ने आज प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका पर अरविंद केजरीवाल को नोटिस जारी किया है, जिसमें उन्हें समन की अवहेलना के आरोपों से बरी करने वाले ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। क्या केजरीवाल की कानूनी मुश्किलें एक बार फिर उन्हें सलाखों के पीछे ले जाएंगी?

Delhi Excise Policy 2026

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 1, 2026

Delhi Excise Policy 2026 :  दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़े कथित घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच कानूनी रस्साकशी तेज हो गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने ईडी की उस याचिका पर संज्ञान लिया है, जिसमें निचली अदालत (राउज एवेन्यू कोर्ट) द्वारा केजरीवाल को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। ईडी का आरोप है कि केजरीवाल ने जांच एजेंसी द्वारा पूछताछ के लिए जारी किए गए कई समन की जानबूझकर अनदेखी की थी। हाई कोर्ट ने अब इस मामले में अरविंद केजरीवाल को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है, जिससे उनकी मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं।

29 अप्रैल को होगी मामले की निर्णायक सुनवाई

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने ईडी द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह कदम उठाया है। अदालत ने नाराजगी जताते हुए नोट किया कि प्रतिवादी (केजरीवाल) को अग्रिम सूचना दी गई थी, फिर भी उन्होंने उपस्थित न होने का विकल्प चुना। कोर्ट ने अब नया नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 अप्रैल की तारीख तय की है। यह सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगी कि क्या मुख्यमंत्री के रूप में समन की अवहेलना करना कानून की नजर में अपराध की श्रेणी में आता है या निचली अदालत का उन्हें बरी करने का फैसला सही था।

ईडी का आरोप: जानबूझकर जांच से बच रहे हैं केजरीवाल

जांच एजेंसी ईडी ने अपनी शिकायत में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि अरविंद केजरीवाल ने बार-बार समन जारी होने के बावजूद जांच में शामिल न होकर कानून की प्रक्रिया में बाधा डाली। ईडी का तर्क है कि केजरीवाल ने समन पर अमल न करने के लिए ‘बेबुनियाद और काल्पनिक’ आपत्तियां उठाईं। एजेंसी का दावा है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने जानबूझकर ऐसी दलीलें पेश कीं जिससे उन्हें पूछताछ का सामना न करना पड़े। ईडी के अनुसार, आबकारी नीति को तैयार करने में अन्य आरोपियों के साथ केजरीवाल का संपर्क था और इस नीति के बदले आम आदमी पार्टी को कथित तौर पर बड़ी रिश्वत हासिल हुई थी।

निचली अदालत के फैसले पर उठे सवाल

इससे पहले, 22 जनवरी को राउज एवेन्यू कोर्ट ने अपने फैसले में अरविंद केजरीवाल को राहत देते हुए उन्हें बरी कर दिया था। निचली अदालत ने कहा था कि प्रवर्तन निदेशालय यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है कि केजरीवाल ने जानबूझकर समन का उल्लंघन किया था। अदालत ने तब ईडी की दलीलों को पर्याप्त नहीं माना था। हालांकि, अब ईडी ने इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी है, यह कहते हुए कि निचली अदालत ने साक्ष्यों और परिस्थितियों को नजरअंदाज किया है। हाई कोर्ट में इस अपील का लंबित होना केजरीवाल के लिए एक नया कानूनी मोर्चा खोलता है।

जमानत और बड़ी पीठ के फैसले का इंतजार

अरविंद केजरीवाल वर्तमान में मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मुख्य मामले में अंतरिम जमानत पर बाहर हैं। उनकी गिरफ्तारी की वैधता और पीएमएलए (PMLA) के कड़े प्रावधानों के तहत गिरफ्तारी की जरूरत से जुड़े पेचीदा कानूनी सवालों को सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही एक बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास भेज दिया है। शीर्ष अदालत का वह फैसला भविष्य में केजरीवाल की कानूनी स्थिति तय करने में मील का पत्थर साबित होगा। इस बीच, समन की अवहेलना का यह मामला उनकी राजनीतिक और कानूनी छवि के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है।

सीबीआई मामले में भी जारी है कानूनी जंग

गौरतलब है कि इसी साल 27 फरवरी को निचली अदालत ने आबकारी नीति से जुड़े सीबीआई (CBI) के मामले में भी केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को बरी कर दिया था। उस समय अदालत ने सीबीआई की जांच को ‘निराधार’ और ‘विफल’ बताया था। हालांकि, सीबीआई ने भी उस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है, जो फिलहाल लंबित है। ऐसे में दिल्ली की पूर्ववर्ती शराब नीति को लेकर चल रही यह कानूनी लड़ाई अब जिला अदालतों से निकलकर पूरी तरह से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में सिमट गई है, जहां हर छोटे-बड़े घटनाक्रम पर देश की नजर टिकी है।

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