Jauhar History: संजय लीला भंसाली की चर्चित ऐतिहासिक फिल्म ‘पद्मावत’ रिलीज के कई साल बाद एक बार फिर चर्चा में है। फिल्म के अंतिम हिस्से में दिखाए गए सामूहिक जौहर के दृश्य को लेकर अभिनेत्री स्वरा भास्कर की हालिया टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। इसके साथ ही जौहर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक संदर्भ और फिल्मों में इसके चित्रण को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
स्वरा भास्कर ने ‘पद्मावत’ के जौहर सीन पर उठाए सवाल
बताते चले कि, दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक चर्चा के दौरान स्वरा भास्कर ने ‘पद्मावत’ में दिखाए गए सामूहिक जौहर के दृश्य पर आपत्ति जताई। उन्होंने इस चित्रण को समस्याग्रस्त बताया और सवाल उठाया कि सामूहिक आत्मदाह को पर्दे पर जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उसका समाज और खासतौर पर यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
दरअसल, स्वरा भास्कर का तर्क था कि किसी महिला के सम्मान या मर्यादा की रक्षा के लिए जीवन समाप्त करने की धारणा को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। उन्होंने इसी विषय को लेकर फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली को पत्र लिखने की बात भी साझा की थी।
जौहर प्रथा क्या थी और इसका इतिहास क्या कहता है?
आपकी जानकारी के लिए बता दे कि, जौहर प्रथा को लेकर इतिहास में अलग-अलग विवरण और व्याख्याएं मिलती हैं। मध्यकालीन भारत के कुछ राजपूत राज्यों के संदर्भ में जौहर का उल्लेख मिलता है। युद्ध में किले के पतन की स्थिति में महिलाओं द्वारा सामूहिक आत्मदाह और इसके बाद पुरुषों द्वारा अंतिम युद्ध करने की परंपरा को कई ऐतिहासिक विवरणों में जौहर और शाका से जोड़ा गया है।
हालांकि, जौहर के कारण, स्वरूप और उससे जुड़े सामाजिक संदर्भों को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं। इसलिए इसके इतिहास को केवल एक ही नजरिए से देखना इतिहास की जटिलता को सीमित कर सकता है।
राजपूती संस्कृति और जौहर की परंपरा
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जौहर की घटनाएं आमतौर पर ऐसे युद्धों के संदर्भ में सामने आती हैं, जब किसी किले की हार लगभग निश्चित मानी जाती थी। ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा शत्रु के हाथों बंदी बनने या संभावित हिंसा से बचने के लिए सामूहिक आत्मदाह किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद किले के पुरुषों द्वारा शाका किया जाता था। इसमें योद्धा अंतिम लड़ाई के लिए निकलते थे और युद्धभूमि में मृत्यु को स्वीकार करने की तैयारी करते थे। जौहर और शाका को उस दौर की युद्ध परिस्थितियों, सामाजिक मान्यताओं और सम्मान की अवधारणा के संदर्भ में समझा जाता है।
चित्तौड़गढ़ के तीन जौहर इतिहास में चर्चित
भारतीय इतिहास में चित्तौड़गढ़ के तीन जौहर विशेष रूप से चर्चित हैं। पहला जौहर 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के संदर्भ में बताया जाता है। इसी घटना को बाद की लोककथाओं में रानी पद्मिनी की कथा से जोड़ा गया है। दूसरा जौहर 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के दौरान रानी कर्णावती से संबंधित बताया जाता है। तीसरे जौहर का उल्लेख 1568 में अकबर के चित्तौड़ अभियान के संदर्भ में मिलता है। इन घटनाओं के विवरण विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और परंपराओं में अलग-अलग रूप में मिलते हैं।
‘पद्मावत’ में जौहर के चित्रण पर क्यों उठ रहे सवाल?
‘पद्मावत’ में जौहर के दृश्य को भव्य सिनेमाई शैली में प्रस्तुत किया गया था। इसी चित्रण को लेकर अब यह बहस फिर सामने आई है कि ऐतिहासिक घटनाओं को फिल्मों में दिखाते समय उनके सामाजिक और नैतिक प्रभावों का कितना ध्यान रखा जाना चाहिए। एक ओर जौहर को राजपूती इतिहास और बलिदान की परंपरा से जोड़कर देखने वाले लोग हैं, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का मानना है कि सामूहिक आत्मदाह को गौरवपूर्ण तरीके से दिखाने से गलत सामाजिक संदेश जा सकता है।
सोशल मीडिया पर भी तेज हुई बहस
स्वरा भास्कर की टिप्पणी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। बहस का केंद्र अब सिर्फ ‘पद्मावत’ का दृश्य नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि इतिहास, स्त्री की agency और सिनेमाई स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस विवाद ने जौहर की ऐतिहासिकता और उसके आधुनिक सामाजिक अर्थों पर एक बार फिर चर्चा छेड़ दी है।










