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बिगड़ी मेरी बनादे ए शेरों वाली मैया, आज से नवरात्र प्रारम्भ

बिगड़ी मेरी बनादे ए शेरों वाली मैया, आज से नवरात्र प्रारम्भ

शारदीय नवरात्र आज से शुरू हो चुके हैं। नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र को आद्याशक्ति की आराधना का सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है। सवंत्सर (वर्ष) में चार नवरात्र होते है।

शरत्-काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्मयं श्रुत्वा भक्ति समन्वितः।।
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः।।

अर्थात् शरदऋतुमें जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उस अवसर पर जो मेरे महात्म्य (दुर्गा शप्तशती) को श्रद्धा-भक्ति के साथ सुनेगा, वह मनुष्य मेरी अनुकंपा से सब बाधाओं से मुक्त होकर धन, धान्य एवं पुत्रादि से सम्पन्न होगा- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। इसी कारण बंगाल में दुर्गा पूजा मुख्यतः शारदीय नवरात्र में ही होती है। शारदीय शक्ति पूजा को विशेष लोकप्रियता त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र के अनुष्ठान से भी मिली।

चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी पर्यंत नौ दिन नवरात्र कहलाते हैं। इन चार नवरात्रों में दो गुप्त और दो प्रकट, चैत्र का नवरात्र वासंतिक और आश्विन का नवरात्र शारदीय नवरात्र कहलाता है। वासंतिक नवरात्र के अंत में रामनवमी आती है और शारदीय नवरात्र के अंत में दुर्गा महानवमी, इसलिए इन्हें क्रमशः राम नवरात्र तथा देवी नवरात्र भी कहते हैं। किंतु शाक्तों की साधना में शारदीय नवरात्र को विशेष महत्व दिया गया है। दुर्गा शप्तशती में देवी स्वयं कहती है-

 

कन्या पूजन का महत्व
कन्या पूजन के माध्यम से ऋषि-मुनियों ने हमें स्त्री वर्ग के सम्मान की ही शिक्षा दी है। नवरात्र में देवी भक्तों को संकल्प लेना चाहिए कि वह आजीवन बच्चियों और महिलाओं को सम्मान देगा और उनकी सुरक्षा के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेगा। तभी सही मायनों में नवरात्र की शक्ति पूजा सम्पन्न होगी। तभी हमारा भी जागरण हो सकेगा और समाज में भी जागरण होगा।

 

नौ शक्तियों से संयुक्त है नवरात्र
भगवान आदि शंकराचार्य विरचित सौंदर्य लहरीमें माता पार्वती के पूछने पर भगवान शंकर नवरात्र का परिचय इस प्रकार देते हैं – ‘नवशक्ति भिः संयुक्तम् नवरात्रंतदुच्यते। एकैवदेव देवेशि नवधा परितिष्ठता।। अर्थात् नवरात्र नौ शक्तियों से संयुक्त है। नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन एक शक्ति की पूजा का विधान है। सृष्टि की संचालिका कही जाने वालीं आदिशक्ति की नौ कलाएं (विभूतियां) नवदुर्गा कहलाती हैं। मार्कण्डेय पुराणमें नवदुर्गा का शैलपुत्री, बह्मचारिणी, चंद्रघण्डा, कूष्मांण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, के रूप में उल्लेख मिलता है।

 

 

कुमारी नवदुर्गा की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं कन्या
देवी भागवतमें नवकन्याओं को नवदुर्गा का प्रत्यक्षविग्रह बताया गया है। उसके अनुसार, नवकुमारियां भगवती के नवस्वरूपों की जीवंत मूर्तियां हैं। इसके लिए दो से दस वर्ष तक की कन्याओं का चयन किया जाता है। दो वर्ष की कन्या कुमारिकाकहलाती है, जिसके पूजन से धन-आयु-बल की वृद्धि होती है। तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति कही जाती है। इसके पूजन से घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। चार वर्ष की कन्या कल्याणीके पूजन से विवाहादि मंगल कार्य सम्पन्न होते हैं। पांच वर्ष की कन्या रोहिणीकी पूजा से स्वास्थ्य लाभ होता है। छह वर्ष की कन्या कालिकाके पूजन से शत्रु का दमन होता है। आठ वर्ष की कन्या शांभवीके पूजन से दुःख-दरिद्रता का नाश होता है। नौ वर्ष की कन्या दुर्गापूजन से असाध्य रोगों का शमन और कठिन कार्य सिद्ध होते हैं। दस वर्ष की कन्या सुभद्रापूजन से मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवी भागवतमें इन नौ कन्या को कुमारी नवदुर्गा की साक्षात् प्रतिमूर्ति माना गया है।

 


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